फिल्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फिल्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

कहीं फिल्म पीपली लाइव का नत्था बन कर रह न जाएं अन्ना हजारे

  राजेश रंजन
अन्ना और नत्था में अंतर तो बहुत हैं लेकिन बहुत समानता भी देखी जा सकती है या कहें कि खोजी जा सकती है। नत्था की जमीन गिरवी पर थी, बचाने के लिए उसने सोचा जान ही दे दी जाए। अन्ना का देश गिरवी पर है, बचाने के लिए जान देने के लिए तत्पर हैं। वहाँ पिपली था, यहाँ जंतर-मंतर,तिहाड़ जेल, जेपी पार्क,रामलीला मैदान है। तमाशा जारी है। पता नहीं क्यों मुझे सारे आन्दोलन अब राष्ट्रीय स्तर के प्रहसन नजर आने लगे हैं। पिपली की तरह  सबकुछ सज चुका है। मीडिया, नेता, प्रशासन, पुलिस, पब्लिक सब हर जगह जुटे हैं और जुट रह गए हैं।
प्रहसन इसलिए यहाँ हमारे यहाँ हर महत्वपूर्ण चीज को प्रहसन में बदलने का इतिहास रहा है। यहाँ यह देश और इसके लोग किसी भी बड़े से बड़े आन्दोलन को प्रहसन में बदलने की कला में माहिर हैं। अब देखिए चौटाला, उमा, मोदी आदि पता नहीं कौन-कौन से लोग इसे समर्थन दे रहे हैं। आन्दोलन को एक व्यक्ति सापेक्ष शब्द समझकर देखिए। हर आन्दोलन के हश्र को उन व्यक्तियों के दिलों से पूछकर देखिए जो इनका समर्थन करते थे। पिपली के नत्था से अन्ना की तुलना करने वाला मेरा एक लंगोटिया मित्र चंद्र मोहन कह रहा था लोहिया के पास बैंक खाता नहीं था और लोहिया के लोग अब बैंक ही साथ में लेकर घूमते हैं। यहाँ के वामपंथी आन्दोलन को लीजिए। फिर राम जन्मभूमि आन्दोलन को लीजिए। वे तो अमेरिकी अधिकारियों को सफाई देते हैं कि राम तो उनके लिए महज सत्ता में आने का मुहरा हैं। गांधी के सत्याग्रह के भी तमाम आंदोलनों की राजनैतिक परिणति या हश्र देखिए। राष्ट्रभाषा के लिए लड़ाई का परिणाम देखिए। सबकुछ। बताएँ अगर एक भी आन्दोलन अपने लक्ष्य को पाने में सफल रहा है।
इस बार कंधा है अन्ना हजारे का - एक बहत्तर साल के बूढ़े का। हालाँकि अन्ना ने भी अपने बाल यूँ ही सफेद नहीं किए हैं, फिर भी मुझे पता नहीं, क्यों लगता है कि बिना वजह हम भारी-भरकम आशा कर रहे हैं। यहाँ इस देश में हमारी आशा के चूल्हे पर अपनी रोटियाँ सेंकने वाले इतने धुरंधर बैठे हैं कि क्या कहने। यहाँ जंतर-मंतर से किसी तहरीर की उम्मीद व्यर्थ है और अगर कुछ ऐसा होने भी लगा तो बाजीगरों की एक स्थापित जमात बैठी हुई है जो उसे फिर से जंतर-मंतर बना देगी।
अन्ना की आँखों में वैसी निराशा तो नहीं है जैसी नत्था के आँखों में दिखती है...लेकिन आजादी के पहले निराशा तो गांधी की आँखों में भी नहीं दिखता होगा। 
उन्हें क्या पता था कि उनके ही सिपाही भारत की आजादी की उनकी आँखों से सामने ऐसी दुर्गति करेंगे कि वे दिल्ली में झंडा पहली बार फहरते भी नहीं देखना चाहेंगे। अन्ना को लोग छोटे गांधी कहते हैं। बड़े गांधी छोटे-मोटे मक्कारों की छोटी-मोटी फौज से नहीं लड़ सके थे, ये छोटे गांधी पता नहीं इन बड़े-बड़े मक्कारों की भारी-भरकम अक्षौहिनी सेना का क्या कर पाएँगे। यहाँ लड़ाई अब दो-एक लोगों से नहीं बची है। भ्रष्टाचार से लड़ाई का मतलब है लगभग हर आदमी से लड़ाई, पूरी कौम से लड़ाई। 
सर्वेक्षण करवाएँ तो पता चलेगा कि ईमानदार आदमी का प्रतिशत शून्य दशमलव शून्य शून्य एक भी नहीं है। और इसलिए तो शक है। भ्रष्टाचार के प्रति एकाएक ये आग कैसी। भूखा तो अन्ना को रहना है...भूखे पेट की उस आग पर थोड़ी-बहुत ही अपनी रोटी भी सिंक जाए शायद इतनी ही हमारी मंशा है।

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

'आरक्षण' पर से मद्रास हाई कोर्ट ने हटाई रोक

मद्रास हाई कोर्ट ने फिल्म आरक्षण पर से रोक हटा ली है। सोमवार को फिल्म से जुड़े एक फायनांसर ने फिल्म के निर्माता फिरोज ए. नाडियाडवाला द्वारा जारी 3.75 करोड़ के एक चेक बाउन्स हो जाने के बाद हाई कोर्ट में फिल्म पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की थी। इस फिल्म के निर्माता प्रकाश झा और फिरोज ए. नाडियाडवाला हैं।
दोनों पक्षों के मामला कोर्ट से बाहर सुलझाने और और याचिकर्ता द्वारा याचिका वापस  लेने  के बाद कोर्ट ने फिल्म के रिलीज़ पर से रोक हटा ली। फिल्म 12 अगस्त को रिलीज़ होने वाली है।

सोमवार, 8 अगस्त 2011

न्यायालय ने फिल्म आरक्षण के प्रदर्शन पर रोक लगाई

मद्रास हाई कोर्ट ने प्रकाश झा की फिल्म 'आरक्षण' की रिलीज़ पर तब तक के लिए रोक लगा दी है, जब तक प्रड्यूसर फिल्म के फाइनेंसरों से उधार ली गई 3.71 करोड़ रुपये की रकम नहीं लौटाते।
अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान और दीपिका पादुकोण स्टारर प्रकाश झा के निर्देशन में बनी यह फिल्म देशभर में 12 अगस्त को रिलीज़ होने वाली है।
जस्टिस वी. पेरियाकारुपिया ने यह अंतरिम आदेश जारी किया। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के फिल्म पर आपत्ति जताए जाने के कारण यह फिल्म पहले से ही विवादों में है। कुछ राजनीतिक दलों ने भी इस फिल्म में आरक्षण के विषय पर चिंता जताई है। फिल्म के खिलाफ दो वकीलों की एक याचिका बंबई हाई कोर्ट में पेंडिंग है

शनिवार, 6 अगस्त 2011

आरक्षण फिल्म के निर्माता प्रकाश झा के घर-दफ्तर पर हमला

फिल्मकार प्रकाश झा ने कहा है कि रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के कार्यकर्ताओं ने उनकी सामाजिक-राजनीतिक फिल्म 'आरक्षण' के विरोध में उनके घर और दफ्तर पर हमला किया। यह फिल्म भारतीय शिक्षा प्रणाली में जातिगत आरक्षण पर आधारित है।
झा
के अनुसार "आरपीआई कार्यकर्ताओं ने यह हमला शनिवार की शाम लगभग 5.30बजे किया। पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची और कार्यकर्ताओं को वहां से खदेड़ दिया।"
आरपीआई प्रमुख रामदास अठावले ने इससे पहले कहा था कि उनकी पार्टी झा की फिल्म को महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं होने देगी क्योंकि इस फिल्म में
'दलित विरोधी' घटनाएं हैं।
इसके अलावा नेशनल कमिशन ऑफ शिड्यूल कास्ट (एनसीएससी) ने भी इस फिल्म को
'दलित विरोधी' करार दिया था। एनसीएससी ने यहां तक कहा था कि झा इस फिल्म को 12 अगस्त को प्रदर्शित करने से पहले उसकी एक समिति को दिखाएं। लेकिन झा शांत रहे।
झा अपनी फिल्म के प्रोमोशन के लिए फिल्म के नायक अमिताभ बच्चन और अन्य कलाकारों के साथ इस समय दिल्ली में हैं। वह हालांकि अपने घर और दफ्तर पर हमले से हुई क्षति से अनभिज्ञ हैं। उन्होंने कहा
, "मुझे अभी तक क्षति के बारे में पता नहीं चला है।"
उल्लेखनीय है कि
'आरक्षण' में सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण, मनोज वाजपेयी और प्रतीक बब्बर ने भी अभिनय किया है।

आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग का कड़ा रुख

राजनीति फिल्म से पूरे देश में छाए निर्माता निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण के प्रदर्शन पर अब पूरी तरह से तलवार लटक गई है। इस फिल्म को लेकर देश भर में उठ रहे विरोध प्रदर्शनों के साथ ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग ने भी इस फिल्म के प्रदर्शन पर विरोध जारी किया है। आयोग ने सभी राज्य सरकारों से अपील की है कि बिना देखे वे अपने राज्य में फिल्म को प्रदर्शित न होने दें। मनोरंजन कर विभाग भी निर्माता निर्देशक प्रकाश झा को 2 बार नोटिस भेजा है जिसमें कहा गया है कि पहले फिल्म को हमें दिखाना होगा उसके बाद इसके प्रदर्शन के बारे में विचार किया जाएगा। महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, राजस्थान में इस फिल्म के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं....... आगे पढ़ें

आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग का कड़ा रुख

राजनीति फिल्म से पूरे देश में छाए निर्माता निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण के प्रदर्शन पर अब पूरी तरह से तलवार लटक गई है। इस फिल्म को लेकर देश भर में उठ रहे विरोध प्रदर्शनों के साथ ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग ने भी इस फिल्म के प्रदर्शन पर विरोध जारी किया है। आयोग ने सभी राज्य सरकारों से अपील की है कि बिना देखे वे अपने राज्य में फिल्म को प्रदर्शित न होने दें। मनोरंजन कर विभाग भी निर्माता निर्देशक प्रकाश झा को 2 बार नोटिस भेजा है जिसमें कहा गया है कि पहले फिल्म को हमें दिखाना होगा उसके बाद इसके प्रदर्शन के बारे में विचार किया जाएगा। महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, राजस्थान में इस फिल्म के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। कहा जा रहा है कि ऎसी फिल्म देश में नए सिरे से फसाद को जन्म देगी। संविधान जिस आरक्षण को मान्यता दे रहा है, यह फिल्म उसका विरोध करती है। महाराष्ट्र के नेता अठावले और भुजबल ने भी फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की है। इन लोगों का कहना है कि यह फिल्म दलित विरोधी है। इससे राज्य में फसाद खडा हो सकता है और कानून व्यवस्था बिगडने का डर है। इस फिल्म के संवादों को लेकर भी भारी आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है। विशेष रूप से प्रोमो में दिखाए जा रहे एक दृश्य जिसमें फिल्म के नायक सैफ अली खान मनोज वाजपेयी से कहते हैं, हमें मेहनत करना सिखाएगे आप। आपके खेत जोते हमने, फसलें काटी हमने, आपके घरों की गन्दी नालियाँ साफ की हमने, यहां तक कि आपकी&द्दह्ल; टटि्टयां सिर पर उठाई हमने। आप हमें मेहनत करना सिखाएंगे। राजस्थान में ब्राrाणों और राजपूतों ने इस फिल्म के विरोध में स्वर उठाना शुरू कर दिया है। राजस्थान के राजपूत करणी सभा का कहना है कि इस फिल्म के प्रदर्शन से राजस्थान के आपसी सौहाद्रü पर काफी असर पडेगा। जनजाति आयोग ने फैसला लिया है कि 8 अगस्त को पहले सरकार इस फिल्म को स्पेशल स्क्रीनिंग के जरिए देखेगी। फिल्म देखने के बाद अगर सरकार को लगता है कि इस फिल्म में ऎसा कुछ नहीं है जिससे देश की कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड सकती है तभी फिल्म को 12 अगस्त को प्रदर्शित किया जाएगा। हालांकि प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण देश में समानान्तर सरकार की तरह चल रही शिक्षा प्रणाली पर जिसमें दिखाया गया है कि किस तरह से शिक्षा के नाम पर कोचिंग संस्थानों ने अपनी मनमर्जी कर रखी है।

“आरक्षण ” को लेकर अमिताभ बच्चन और प्रकाश झा पर मुकदमा !!


पटना । अमिताभ बच्चन की बहुचर्चित फिल्म आरक्षण के विरोध की हवा महाराष्ट्र, यूपी से होकर बिहार पहुंच गई है। बिहार विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के छोटे भाई व अंबेडकरवादी समाज विकास परिषद के सचिव अभितेष उर्फ अभय कुमार चौधरी ने अमिताभ बच्चन और प्रकाश झा के खिलाफ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण एक्ट-1989 की धारा-3(10) के तहत परिवाद पत्र दायर किया।   
राज्य के ऊंचे ओहदेदार के भाई बताए जा रहे अभितेष चौधरी ने परिवाद पत्र में फिल्म को आरक्षण विरोधी बताते हुए कहा है कि इससे अंबेडकरवादी समाज विकास परिषद के सदस्याओं के अलावा हजारों-लाखों लोग आहत हुए हैं। परिवाद पत्र में फिल्म के एक संवाद -‘हम मेरिट में विश्वास रखते हैं आरक्षण में नहीं’ पर आपत्ति जताई गई है। परिवादी ने फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने के साथ मामले को अनुसूचित थाने में दर्ज कराने की मांग की है। मामले की सुनवाई 9 अगस्त को होगी। 
फिल्म के प्रमोशन पर आपत्ति :
परिवाद पत्र में तीन अगस्त को पटना के पीएंडएम मॉल में हुए प्रमोशनल कैंपेन का जिक्र करते हुए बताया गया है कि फिल्म के मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन और निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए लोगों को फिल्म देखने का आग्रह किया। परिवाद में यूपी की मायावती सरकार द्वारा फिल्म के प्रचार-प्रसार की अनुमति नहीं देने और महाराष्ट्र के घटनाक्रम का भी हवाला दिया गया है।
प्रोमो से हो रहे अपमानित :
केस की पैरवी कर रहीं अधिवक्ता श्रुति सिंह ने बताया कि हाल के दिनों में काफी स्थानों पर फिल्म के प्रोमो दिखाए जा रहे हैं जिससे अनुसूचित जाति के लोग लगातार अपमानित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने आरक्षण फिल्म के निर्माण में धन लगाने से लेकर प्रचार-प्रसार करने वाले सभी लोगों को दोषी बताया है।

अमिताभ बच्चन और पटना के अधकचरे पत्रकार

सदी के महानायक का दर्ज़ा पा चुके अमिताभ बच्चन अपनी आने वाली फिल्म आरक्षण के प्रचार के लिए जब बिहार की राजधानी पटना पहुंचे तो दो दिनों के अपने प्रवास के दौरान उन्होंने कई खट्टे-मीठे अनुभव लिए भी और दिए भी। वे बिहार आए तो थे प्रकाश झा के अनुरोध पर लेकिन मीडिया से ऐसे दो-चार हुए कि उन्हें यह अनुभव याद रहे ना रहे, वहां के पत्रकारों पर उनके अनोखे कलात्मक व्यक्तित्व की छाप शायद वर्षों तक रहे।
अमिताभ से जो भी मिला, उनके अत्यंत विनम्र अंदाज और सहज आत्मीय भाव का फैन बन गया। यहाँ तक कि प्रकाश झा के शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स परिसर में मेले जैसी भीड़ के बीच आयोजित ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ में हास्यास्पद सवालों से भी उनका संयम नहीं टूटा। अपने करीयर की शुरुआत में मीडिया को नो-एंट्री कह कर विवादों में रह चुके अमिताभ ने प्रेस कांफ्रेंस मे घुस आए कुछ अति उत्साही युवा मीडियाकर्मियों के बार-बार पूछे गए अटपटे और मूर्खतापूर्ण सवालों पर भी अमिताभ ने ख़ुद को असहज नहीं होने दिया।
सवालों की बानगी देखिए। एक नौजवान पत्रकार ने बड़ी ही संजीदगी से पूछा, ”आप को नहीं लगता कि जब भगवान को एक्टिंग करने का मन किया तो वो आप के रूप में अवतरित हुए?” इस पर जहां इक तरफ हॉल में मौजूद पत्रकार बगलें झांकने लगे वहीं अमिताभ क्या बोलूँ का भाव लिए हुए चुप ही रहे।
एक अन्य पत्रकार ने पूछा, ”कल आप बंगलौर में थे, तो क्या उसी शहर में कभी शूटिंग के दौरान अपने साथ हुए हादसे को आपने याद नहीं किया?”
अमिताभ बच्चन इस सवाल पर क्षण भर के लिए सोच में पड़ गए, फिर थोड़ा सोच कर कहा, ”किसी शहर को मैं किसी दुर्घटना के साथ जोड़ कर याद नहीं करता।
अभी सवाल-जवाब चल ही रहा था कि किसी मीडियाकर्मी ने अमिताभ से फ़रमाइश कर दी कि वे अपनी किसी भोजपुरी फ़िल्म का डायलॉग सुनाएं। अमिताभ थोड़े सकपकाए, फिर विनम्रता से कहा कि अभी याद नहीं है। फ़ौरन किसी ने अनुरोध मारा कि चलिए अपनी फ़िल्म का कोई गाना ही सुना दीजिए। बिल्कुल अपमान जनक सी लग रही स्थिति को ख़ुद अमिताभ बच्चन ने ही बहुत शालीनता के साथ संभाला। उन्होंने साथ में बैठे प्रकाश झा और मनोज बाजपेयी समेत तमाम पत्रकारों को हो रही शर्मिंदगी का ख़्याल करते हुए इस फरमाइश को हंस कर टाल दिया।
इतने में किसी ने सवाल उछाला, ”मुंबई फ़िल्म उद्योग के सबसे स्मार्ट और अभी भी जवान जैसी आपकी शक्ल-सूरत का राज़ क्या है? इस पर उनके अभिनय-कुशल मन से रहा नहीं गया और झट गंवई अंदाज में बोले, ”अरे ई सब आप ने कहाँ से देख लिया? यहाँ तो बाल-वाल सब सफ़ेद पड़े हैं।”
लेकिन बात यहीं रुकी नहीं और ज़ोर से किसी ने सवाल दागा- अच्छा ये तो बताइए कि आप अपने घर में पोती का इंतज़ार कर रहे हैं या पोता का। अमिताभ ने सहज भाव से जवाब दिया कि वे बेटा या बेटी में भेदभाव नहीं करते। सवाल पूछने वाले बुद्धिमान मीडियाकर्मी (पत्रकार नहीं लिखा जा सकता) को इस जवाब से संतोष नहीं हुआ और उसने पहले से भी अधिक ज़ोर डालकर पूछा, ”फिर ये तो बता दीजिए कि ये ख़ुशख़बरी हमलोगों को कब तक मिलेगी?”
इस बार अमिताभ ने नहले पर दहला मारा और हास्यपूर्ण शरारती मुद्रा में हाथ जोड़कर तपाक से कहा, ”भाई साहब, मैं गर्भवती नहीं हूँ।” इतना सुनना था कि पूरा हॉल ज़ोरदार ठहाके से देर तक गूंजता रहा। (मीडिया खबर)

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

.....और पटना से यूं फुर्र हो गये बिग बी

@दिलीप कुमार गुप्ता
पटना हवाई अड्डे पर नन्हीं गुन्नू बार-बार अपने पिता से अमिताभ बच्चन के आने तक रूकने का जिद कर रही थी। उनके आटोग्राफ के लिए वह अपने पिता पर दूसरी फ्लाइट से चलने के लिए जिद कर रही थी। बच्ची को मचलता देख उसे विदा करने आये उसके नाना ने गुन्नू से उसका आटोग्राफ बुक ले लिया। इस वादे के साथ कि वे उसके आटोग्राफ बुक में श्री बच्चन से जरूर आटोग्राफ ले लेंगे। गुन्नू चली गई, लेकिन उसके नाना उसका आटोग्राफी बुक लिये एयरपोर्ट पर मौजूद सदी के महानायक के प्रशंसकों में शामिल हो गये। इस उम्मीद में कि जब वे आयेंगे तो आटोग्राफी ले लेंगे।
लेकिन ऐसा हो न सका। महानायक आये, लेकिन बाहर मौजूद अपने प्रशंसकों की भीड़ से बचते हुए एयरपोर्ट प्रबंधक के कमरे से होकर सीधे बाहर खड़ी गाड़ी में बैठ चले गये। उनके इंतजार में खड़े सैकड़ों प्रशंसक उनकी एक झलक पाने की ललक लिये वापस लौट गये। निराश वापस लौटने वालों में गुन्नू के नाना भी थे।
बुधवार को सेवा विमान से दोपहर दो बजे के करीब श्री बच्चन राजधानी पहुंचे। अपने महानायक को चुपचाप निकलता देख वहां मौजूद उनके प्रशंसकों व मीडियाकर्मी उनकी गाड़ी की तरफ लपके, लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें गाड़ी के आसपास भी फटकने नहीं दिया। एयरपोर्ट से श्री बच्चन सीधे प्रकाश झा के घर चले गये। बिग बी के आने की सूचना पर बुधवार 12 बजे से ही उनके प्रशंसक एयरपोर्ट पर जमा होने लगे थे। एक बजे उनके राजधानी पहुंचने की सूचना थी। हालांकि उनका किंगफिशर विमान अपराह्न 2.10 बजे स्थानीय एयरपोर्ट पर उतरा। श्री बच्चन के जाने के दो मिनट बाद आरक्षण फिल्म में उनके सह अभिनेता मनोज वाजपेयी भी बाहर आये। लेकिन उनकी तरफ किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।