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मंगलवार, 16 अगस्त 2011

संविधान के उपर संसद का प्रभुत्व नहीं :सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि 'कानून का शासन' संविधान के आधारभूत ढांचे का अभिन्न हिस्सा है.
प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिया की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, 'हमारे संविधान में अवधारणा के रूप में कानून के शासन की कोई जगह नहीं है बल्कि इसे हमारे संविधान की मूलभूत विशेषता के रूप में रेखांकित किया गया है जिसे संसद द्वारा भी निरस्त या नष्ट नहीं किया जा सकता और वास्तव में यह इससे बंधी है.
पीठ ने कहा, 'केशवानंद भारती के मामले में इस अदालत ने यह स्पष्ट किया था कि कानून का शासन मूलभूत ढांचे के सिद्धांत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है. कानून का शासन संसद की प्रधानता की पुष्टि करता है लेकिन साथ ही इसे संविधान के ऊपर प्रभुत्व देने से इंकार करता है.'
इसने कहा, 'कोई भी कानून जो किसी व्यक्ति को निजी स्वार्थ से उसकी निजी संपत्ति से वंचित करे वह गैर कानूनी और अनुचित होगा और यह कानून के शासन को कमजोर करता है तथा इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.'
संविधान पीठ ने व्यवस्था दी कि कानून का शासन संसद की विधायी शक्तियों पर एक 'अंतर्निहित परिसीमा' है. पीठ ने हालांकि  संवैधानिक अदालतों को कानून के शासन के सिद्धांत को पूर्ण व्यवस्था मानने के प्रति आगाह किया और कहा कि सिद्धांत को दुर्लभ मामलों में उन कानूनों को खत्म के लिए क्रियान्वित किया जाना चाहिए जो दमनकारी हैं और जो हमारे संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन हैं.

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

राष्ट्रपति ने राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका खारिज करने में 5 वर्ष लगाए !


राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारों की दया याचिकाओं को खारिज कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2000 में इन हत्यारों को मौत की सजा दिए जाने की पुष्टि की थी।
उच्चतम न्यायालय ने 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या के लिए प्रतिबंधित लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के सदस्यों मुरूगन, संथान, पेरारिवलन और नलिनी को श्रीपेरंबूदूर में मौत की सजा सुनाई था।राष्ट्रपति भवन के एक प्रवक्ता ने कहा कि राष्ट्रपति ने पिछले सप्ताह इन तीनों आरोपियों की दया याचिका को खारिज कर दिया है।उच्चतम न्यायालय ने मुरूगन, संथान और पेरारिवलन की मौत की सजा की पुष्टि कर दी और नलिनी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।इन तीनों पर आपराधिक साजिश रचने और आत्मघाती हमले की साजिश को अंजाम देने का आरोप है। इन तीनों ने उच्चतम न्यायालय की पुष्टि के बाद राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर की थी।गृह मंत्रालय ने 21 जून 2005 को अपनी राय भेजी थी जिसे 23 फरवरी 2011 को समीक्षा के लिए भेजा गया और मंत्रालय ने अपनी राय इस वर्ष आठ मार्च को फिर से राष्ट्रपति को सौंप दिया।इससे पहले राष्ट्रपति ने गृह मंत्रालय की सिफारिश पर पंजाब के देविंदर पाल सिंह भुल्लर और असम के महेंद्र नाथ की दया याचिका को खारिज कर दिया था।

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

हर स्टूडेंट को अपनी उत्तर पुस्तिका देखने का अधिकार हैः सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरटीआई के तहत स्टूडेंट को उत्तर पुस्तिका देखने का अधिकार है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस मामले में दिए अपने फैसले में कहा था कि स्टूडेंट को आरटीआई के तहत उत्तर पुस्तिका देखने का अधिकार है। इस फैसले को कुछ स्टेट कमीशन, सीबीएसई और कोलकाता यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम
कोर्ट ने कहा कि किसी भी परीक्षा में शामिल हुए स्टूडेंट को अपनी उत्तर पुस्तिका देखने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि स्टूडेंट ने चाहे जो एग्जाम दिया हो, अगर वह आरटीआई के तहत अपनी उत्तर पुस्तिका देखना चाहता है तो वह देख सकता है।
कलकत्ता
हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाओं को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में सीबीएसई, कोलकाता यूनिवर्सिटी, बिहार पब्लिक सर्विस कमिशन, असम पब्लिक सर्विस कमिशन और इंस्टिट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया की ओर से याचिका दायर की गई थी।

सोमवार, 8 अगस्त 2011

बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवादः इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका मंजूर

सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटे जाने के फैसले के खिलाफ सोमवार को अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की एक याचिका स्वीकार कर लीहै।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा
की पीठ ने याचिका को स्वीकार कर उसे मुख्य मामले से सम्बद्ध कर दिया.
सुन्नी वक्फ बोर्ड ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राम जन्मभूमि
पुनरुद्धार समिति, अयोध्या विवाद पर आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के 30 सितम्बर, 2010 के फैसले से पहले मामले में कोई पक्ष नहीं था.
वक्फ बोर्ड के वकील अनूप चौधरी ने अदालत से कहा कि समिति एक अन्य मामले में
उच्च न्यायालय गया था, जिसे खारिज कर दिया गया था. अब वह एक ऐसे मामले में याचिका दायर नहीं कर सकता है, जिसमें वह उच्च न्यायालय में पक्ष नहीं है.
न्यायालय ने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड की आपत्ति बरकरार रहेगी और सुनवाई के दौरान इस पर विचार किया जाएगा.

ज्ञात हो कि उच्च न्यायालय के फैसले में पिछले वर्ष विवादित स्थल को तीन
दावेदारों के बीच तीन हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने नौ मई, 2011 को इस फैसले को 'विचित्र और चकित' करने वाला बताते हुए उसे स्थगित कर दिया था.
इस फैसले में केंद्रीय गुम्बद का निचला हिस्सा राम लला को
, राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़ा को और शेष हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिए जाने का आदेश दिया गया था.