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मंगलवार, 2 अगस्त 2011

फ्रेंडशिप डे मनाइये जरा संभलकर

@सन्नी शरद
दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के एक पल....
हर साल भारत में फ्रेंडशिप डे (यानि कि सिर्फ और सिर्फ दोस्ती का दिन) मानाने की एक नई परम्परा का आगाज हुआ है। अब ये कहाँ तक सही है और कहाँ तक गलत है, ये बहस का मुद्दा हो सकता है। हर कोई इसे अपने अंदाज में देखता है और इसके रंग में मगन हो जाता है। कोई इसे अच्छा कहता है तो कोई लाठी और डंडा लेकर इसका विरोध करता है।
आज के इस गला काट प्रतियोगिता के युग में दोस्ती का ये जो नया संस्करण हुआ है मुझे तो बड़ा भाता है। इस प्रतियोगितावादी जिंदगी में तिल और तंडुल के चक्कर में आज हम सभी पिसते चले जा रहे हैं और अपनों से दूर चले जा रहे हैं। रात को देर तक जागना और सुबह होते ही बॉस का फ़ोन आना और बिना नहाये ऑफिस भागना। बस आज हमारी जिंदगी यहीं तक सीमीत हो गयी है। तनाव, ब्लड प्रेसर बढ रहा है। सुबह का नास्ता दोपहर को और दोपहर का रात को भी करने की भी फुर्सत नहीं मिल रही है. ज्यादातर लोग ६० से पहले ही जिंदगी से रिटाएर हो जा रहे हैं। ऐसी जिंदगी में यदि लोग दो पल खुशी का मना ले तो इसमें क्या हर्ज़ है।
शाहरुख़ खान ने एक फिल्म में कहा है की एक लड़का और लड़की कभी दोस्त हो ही नहीं सकते हैं. और अब लोग भी कहते हैं फ्रेंडशिप का मतलब अब वल्गर हो गया है। ये अब सिर्फ लडको और लड़कियों में ही जयादा होता है। लेकिन ये गलत बात है। आज भी अपने आप में आधी दुनिया को समाने वाला फेसबुक इस बात का गवाह है की दोस्तों के मन में दोस्ती अभी जिन्दा है. फेसबुक पर कई ऐसी बात पड़ने को मिलेगी जिसमे कोई अपनी जिंदगी में कुछ हांसिल करके अपने बचपन के दोस्त को खोज रहा है।
दोस्त कोई भी किसी का हो सकता है। यहाँ तक आज एक पिता जी भी अपने बेटे के साथ दोस्त जैसा वैव्हार रखते हैं। ताकि उनका बेटा क्या कर रहा है ये उन्हें पता चल सके।
मेरी नज़र में फ्रेंडशिप डे मनाने के फायदे:
·                     दोस्त को समय देने का एकलौता पर्व।
·                     दोस्तों को याद करने का अच्छा मौका।
·                     दोस्तों के साथ समय बिताने का अच्छा बहाना।
·                     उन दोस्तों को भी याद करने का अच्छा मौका जिनसे छोटी - मोटी बात पर जगडा हुआ हो।
·                     इसमें दोस्त अपने दोस्त को कार्ड और फूल देते हैं, ऐसे में ऐसे में कार्ड और फूल वाले को 
     रोजगार मिलता है।
·                     किसी कैंटीन या ढाबे में गए तो उस दुकान वाले को फायदा।
·                     भूले बिछड़े दोस्तों को याद करने और उन्हें खोजने का अच्छा मौका।
·                     ऑफिस से छुट्टी लेने का एक अच्छा बहाना।
·                     इसी बहाने कई और नए दोस्त बन जाती हैं।
·                     सभी ढाबे और पार्क वाले का बल्ले बल्ले।
फ्रेंडशिप डे मनाने की हानियाँ: 
·                     अपनी संस्कृति को भूलते जाना और पश्चिमी संस्कृति को अपनाना।
·                     इम्पोर्टेड गिफ्ट दोस्तों को देना। न की देश में गरीबों द्वारा बनाया गया गिफ्ट देना।
·                     लडको द्वारा लड़की का इस दिन का गलत फायदा उठाना।
·                     लड़की के लिए आज का दिन बुरा क्यूंकि घरवाले घर से निकलने नहीं देते हैं।
निष्कर्ष:

दोस्ती के लगभग सभी पहलु को मैंने आज के परिदृश को देखते हुए दर्शाया है। वैसे मुझे ये अच्छा लगता है क्यूंकि इस पर्व में सभी दोस्त एक जगह मिल कर मस्ती करते हैं। और अपना हाले दिल एक दुसरे से बायाँ करते हैं।

सोमवार, 1 अगस्त 2011

कम से कम कॉल तो कर लो पत्रकारिता के निकम्मों !!

हर जगह रिज्यूम  देकर आ गया, लेकिन कहीं से कोई सुगबुगाहट नहीं है। रिज्यूम में साफ-साफ लिखा है कि मैं न्यूज़ रूम साफ्टवेयर पर काम करना अच्छी तरह से जानता हूँ। स्क्रिप्टिंग भी काफी अच्छी कर लेता हूँ।  साथ-साथ हर वो काम करना जानता हूँ,जो कि एक न्यूज़ चैनल की प्रोडक्शन टीम में होता है। फिर भी किसी अंधे को दिखता क्यों नहीं कि जिसने भी अपना रिज्यूम दिया है और उसमें लिखा क्या है। किसी के अन्दर ईमानदारी नाम की कोई चीज़ नहीं है। सब जानते है कि किस को कब और कैसे काम पर रखना है। मेरे पास लगभग हर चीज़ है पर फिर भी किसी जगह से कॉल क्यों नहीं आती है ! कारण है कि मेरे पास मीडिया में काम करने के लिए सबसे जरूरी क्वालिटी सिफारिश नही है।
कई ऐसे लोग हैं, जिनको ढंग से हिंदी टाइपिंग भी नहीं आती है और वह शहर के नामी गिरामी चैनलों में काफी अच्छी जगहों पर काम कर रहे हैं। उनमें से कुछ  नाम तो ऐसे है जिन्हें कुछ भी नहीं आता और जब भी मुझसे मिलते है तो कुछ ना  कुछ पूछते ही हैं। अब ऐसे लोग कैसे बहाल हो गये, किसी के पास है इस बात का जवाब ! जवाब हर वो इंसान जानता है जो इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।
अगर मेरे पास किसी की सिफारिश नहीं है, किसी की पैरवी नहीं है तो इसमे मेरा क्या दोष है! मैं जानता हूं कि मै किस काम को ज्यादा अच्छे से कर सकता हूँ। मेरा कहने का सिर्फ इतना ही मकसद है कि जो अपना रिज्यूम कहीं जमा करते हैं तो उनलोगों को चाहिये कि जो उसने लिखा है वो सही है या नहीं,उसकी जाँच तो कर लें। पर कोई ये ज़हमत उठाना नहीं चाहता,क्योंकि उनके रिज्यूम पर किसी का रेफरेंस नहीं लिखा होता है।
इस बात का उदाहरण है पटना का एक बहुत बड़ा अख़बार, जोकि अपने आप को सबसे बड़ा अख़बार बताता है। उसमें परीक्षा आयोजित कि गई थी। मैं और मेरे कुछ मित्र परीक्षा देने के लिए बड़े मन से तैयारी कर के गये थे। परीक्षा शुरू हुई। अचानक हमने सुना कि जो लोग वहाँ बैठे थे। निरीक्षण करने के लिए उनमें वो महोदया भी बैठी थी, जो कि वहाँ की एचआर थीं और उनकी देखरेख में हीं चयन की सारी प्रक्रिया सम्पन्न होनी थी। ख़ुद वह बोल रही थी कि “क्या बेकार में परीक्षा का आयोजन किया है जबकि पहले से ही सारी सीटें बुक हो चुकी हैं”।
इस बात से क्या पता चलता है यही कि जहां भी जाओ वहां प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं, पर परोक्ष रूप से नो वैकेंसी  की तख्ती अन्दर से लगी रहती है। यदि किसी बाहर के आदमी को रखना हीं नहीं है तो साफ-साफ क्यों नहीं एक तख्ती पर लिख कर टांग देते कि यहां केवल सिफारिश वालों को ही रखा जाता है।
शिकायत है कि अगर आप के यहाँ कोई अपना रिज्यूम जमा करता है तो कम से कम उसको बुलाकर यह तो जांच कर लो कि वह जो दावे कर रहा है,उसमें कितनी सच्चाई है। यदि उसके बाद लगे कि वह किसी काम का नहीं है तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दो । कम से कम कॉल तो करो।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

मुंडा सरकार ने झारखंड के पत्रकारों के बीच बांटी रेवड़ियां

30 में 26 चहेतों को दिया 50-50 हजार रु. के मीडिया फेलोशिप 

झारखंड सरकार ने 26 पत्रकारों को 50-50 हजार रुपये की मीडिया फेलोशिप की घोषणा कर दी है। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने संवाददाता सम्मेलन में चयनित पत्रकारों की सूची जारी की। जनहित के मुद्दों पर शोध आधारित प्रकाशनों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विभाग के द्वारा शोध एवं अन्वेषण की योजना प्रारम्भ की गयी है। इसके लिए विभागीय समिति गठित कर अखबारों में विज्ञापन देकर प्रविष्टियाँ आमंत्रित की गई थी। गठित विभागीय समिति ने कुल 26 आवेदकों का चयन फेलोशिप प्रदान करने हेतु किया है। प्रत्येक फेलोशिप हेतु पचास हजार रुपये की राशि प्रदान की जानी है। बकौल चयन समिति के सदस्य डॉ.विष्णु राजगढिया,चयन समिति के पास कुल 30 आवेदन ही प्राप्त हुए थे।

चयन समिति में डा॰ रमेश शरण (स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र विभाग, रांची विश्वविद्यालय), श्री चंदन मिश्र (ब्यूरो प्रमुख, दैनिक हिन्दुस्तान), डा॰ विष्णु राजगढि़या (ब्यूरो चीफ, नई दुनिया), श्री विजय पाठक (स्थानीय सम्पादक, प्रभात खबर), श्री सुमन श्रीवास्तव (ब्यूरो प्रमुख, दी टेलीग्राफ), श्री अरविन्द मनोज कुमार सिंह (सहायक क्षेत्रीय निदेशक, इग्नू), श्री राजीव लोचन बख्शी (संयुक्त सचिव, सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग) तथा श्रीमती स्नेहलता एक्का (उप निदेशक, सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग) शामिल है।
मीडिया फेलोशिप हेतु चयनित पत्रकार एवं उनका शोध-विषय-
1. अनुपमा कुमारी- पंचायती राज और महिला सशक्तिकरण
2. आलोका- झारखण्ड में मनरेगा का महत्व
3. अनंत - हजारीबाग में लतिका का सामाजिक संघर्ष
4. योगेश्वर राम - पंचायत व्यवस्था में ग्राम सभा की भूमिका
5. आशिषी कुमार सिन्हा - बिरहोर समुदाय की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली
6. ओमप्रकाश पाठक - ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य अधिसंरचना
7. रूपक कुमार - झारखंड में जैव-विविधता और जीविकापार्जन
8. सुरेन्द्र लाल सोरेन - कचड़ा चुननेवाले बच्चों के बेहत्तर भविष्य की संभावन
9. सर्वजीत - झारखंड में सूचना का अधिकार
10. प्रशांत जयवर्द्धन - वन प्रबंधन और पारंपरिक नियम
11. नदीम अख्तर - झारखण्ड राज्य में कृषि में तकनीक का इस्तेमाल
12. महेश्वर सिंह छोटु - आदिम जनजाति पहाडि़या कल आज और काल
13. नौशाद आलम - झारखण्ड में समुदायिक वन प्रबंधन की प्रासंगिकता
14. संजय श्रीवास्तव - झारखण्ड के विकास में संसदीय राजनीति का योगदान
15. शैली खत्री - राँची में बच्चों के विकास की स्थिति ।
16. प्रशांत झा - तसर सिल्क उद्योग और इससे जुड़े लोगों की स्थिति
17. कुमार संजय - बच्चों के भोजन और पोषण का अधिकार
18. विकास कुमार सिन्हा - झारखण्ड के पर्यटन स्थलों की स्थिति व विकास।
19. तनवी झा - झारखंड में समुदाय आधरित स्वास्थ्य सेवा
20. अमित कुमार झा - नेशनल गेम्स आयोजन से झारखण्ड में खेल प्रतिभाओं का उदय।
21. चन्दो श्री ठाकुर - राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का सामुदायिक परिदृश्य
22. संजय कृष्ण - ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर महिला पलायन का असर
23. सलाउद्दीन- हजारीबाग में एड्स का विस्तार एवं नियंत्रण
24. शैलेश कुमार सिंह - स्वर्णिम झारखंड में नक्सलवाद का अंत
25. पंकज त्रिपाठी - राज्य में बिजली की स्थिति, समस्या और समाधान।
26. शक्तिधर पांडेय - लोक स्वास्थ्य और आंगनबाड़ी सेवाओं के सुदृढ़ीकरण में समुदाय की भूमिका।
बहरहाल, समिति द्वारा अनुसंशित जिन उम्मीदवारों को सरकार ने फेलोशिप प्रदान करने की घोषणा की है,उनका गहन अवलोकन करने पर यह साफ जाहिर होता है कि मुंडा सरकार ने झारखंड की पत्रकारिता के एक खास वर्ग के चहेतों के बीच मात्र रेवड़ियां बांटने का कार्य की है। वाकई में जिन पत्रकारों को इसका लाभ मिलनी चाहिए,उसे नहीं मिलने की परंपरा कायम रखते हुये पारदर्शिता नहीं बरती गई है। और यदि इसकी न्यायपूर्ण जांच की जाए तो सबकी कलई खुलनी तय है। चयन समिति में कई ऐसे लोग हैं,जिनसे पारदर्शिता की उम्मीद कदापि नहीं की जा सकती। वरिष्ठ पत्रकार रजत कुमार गुप्ता का कहना है कि इनके चयन का आधार सार्वजनिक होना चाहिए।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

ऐ मेरे वतन के लोगों...जो शहीद हुए हैं उनकी,जरा याद करो कुर्बानी

26 जुलाई 1999 का दिन भारतवर्ष के लिए एक ऐसा गौरव लेकर आया, जब हमने सम्पूर्ण विश्व के सामने अपनी विजय का बिगुल बजाया था। इस दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया। कारगिल युद्ध भारत के इतिहास में एक ऐसी बानगी रखता है जब पूरा देश अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध था। इस युद्ध में वीरता और बलिदान के ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिससे देशवासियों को अपनी सशस्त्र सेनाओं पर गर्व करने और उनके द्वारा दर्शाए गए अदम्य साहस का अनुकरण करने की प्रेरणा देते रहेंगे।
कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि : इस बार छ्द्म युद्ध के बजाय पाकिस्तान की सेना की नार्दन लाइट इन्फैंट्री के नियमित सैनिक मुजाहिदीनों के भेष में लाइन ऑफ कंट्रोल पार कर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर गए थे। इसकी वजह थी पाकिस्तान सेना व आईएसआई के दो नापाक मकसद, पहला द्रास और कारगिल सेक्टर की सामरिक महत्व की ऊँची चोटियों पर कब्जा कर लेह-सियाचिन की आपूर्ति को बाधित करना; दूसरा संयुक्त राष्ट्र में एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को उठाकर हताश हो रहे जेहादियों में नई जान फूँकना।
इस बार इस युद्ध की शुरुआत हुई 6 मई से जब गरकोन घाटी में अपने मवेशियों को ढूँढ़ने गए ताशी नामयाल और त्रेशिंग मोरप ने कुछ हथियारबंद लोगो को पहाड़ी की ओर जाते और संगर बनाते देखा। पहले-पहले इस घुसपैठ को दुश्मन का लॉंग रेंज पेट्रोल समझा गया, सामान्य तौर पर इस तरह की घुसपैठ को कमांडर स्तर की बैठकों में चाय पीते-पीते सुलझा लिया जाता है पर इस बार चाय की प्याली में ऐसा बड़ा तूफान उठने वाला था जो कुछ ही दिनों में दुनिया की सबसे भीषणतम लड़ाइयों में से एक बन गया।
हिमालय से ऊँचा था साहस उनका : इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नहीं देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है।
इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।
Saurabh Kalia
जाट रेजिमेंट के ले. सौरभ कालियाः अपने 4 जवानों (सिपाही अर्जुनराम, भगवान बागरिया, भीकाराम व नरेशसिंह) के साथ 14 मई को पेट्रोलिंग पर निकल गए और बजरंग पोस्ट पर बैठे घुसपैठियों का ले. कालिया ने मुकाबला किया पर गोला-बारूद खत्म होने पर दुश्मन की गिरफ्त में आ गए। तीन हफ्ते बाद उनके और साथियों के क्षत-विक्षत शव भारतीय अधिकारियों को सौंपे गए। उन्हे बुरी तरह यातनाएँ देकर मारा गया था।
देखते ही देखते इस क्षेत्र में स्थिति भारत के हाथ से निकलने लगी। ऊँची पोजीशन पर बैठे घुसपैठिए भारतीय फारवर्ड पार्टियों पर भारी पड़ने लगे। 18 मई को 56वीं मॉउंटन ब्रिगेड़ ने पॉइंट 4295 और 4460 पर कब्जा कर लिया था तब जाकर भारतीय सेना ने खुलासा किया कि पाकिस्तानी सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल में कई जगह घुसपैठ की है। तत्कालीन सेना अध्यक्ष वीपी मलिक 23 मई को कारगिल पहुँच चुके थे।
भारत के वीर सपूत : खराब होते हालात को देख वायुसेना से मदद माँगी गई। 27 मई को स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा और के. नचिकेता मिग 21 विमानों से युद्ध क्षेत्र में उड़ान भर रहे थे। तकनीकी खराबी की वजह से के. नचिकेता को आपात स्थिति में विमान से इजेक्ट करना पड़ा। उनकी स्थिति का पता लगाने के लिए स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा ने नीची उड़ान भरने का फैसला किया मगर स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का विमान दुश्मन द्वारा दागी गई स्ट्रिंगर मिसाइल का शिकार हुआ, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और पैराशूट से उतरते समय भी शत्रुओं पर गोलीबारी जारी रखी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को (मरणोपरांत) वीर चक्र से सम्मानित किया गया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इस युद्ध में पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए थे जिन्हें 3 जून 1999 को वापस भारत को लौटा दिया गया।
Vikram Batra
‘ये दिल माँगे मोर’ - हिमाचलप्रदेश के छोटे से कस्बे पालमपुर के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा उन बहादुरों में से एक हैं, जिन्होंने एक के बाद एक कई सामरिक महत्व की चोटियों पर भीषण लड़ाई के बाद फतह हासिल की थी।
यहाँ तक कि पाकिस्तानी लड़ाकों ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया था और उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से नवाजा था। मोर्चे पर डटे इस बहादुर ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी डेल्टा टुकड़ी के साथ चोटी नं. 4875 पर हमला किया, मगर एक घायल साथी अधिकारी को युद्धक्षेत्र से निकालने के प्रयास में माँ भारती का लाड़ला विक्रम बत्रा 7 जुलाई की सुबह शहीद हो गया। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने अदम्य साहस व बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।
Manoj Pandey
1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए।
गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे न छोड़ने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।
Anuj Nair
17 जाट रेजिमेंट के बहादुर कैप्टन अनुज नायर टाइगर हिल्स सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी ‘वन पिंपल’ की लड़ाई में अपने 6 साथियों के शहीद होने के बाद भी मोर्चा सम्भाले रहे। गम्भीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अतिरिक्त कुमुक आने तक अकेले ही दुश्मनों से लोहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना इस सामरिक चोटी पर भी वापस कब्जा करने में सफल रही। इस वीरता के लिए कैप्टन अनुज को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया।
M. Sarvanan
कारगिल में पाकिस्तानी सेना के होने का सीधा प्रमाण दिया 1 बिहार के जाँबाज अधिकारियों व जवानों ने। 29 मई को मेजर सर्वानन और उनके 15 जवानों ने पॉइंट 4268 पर आक्रमण किया। यह लड़ाई आमने-सामने की थी। दुश्मन द्वारा जबरदस्त गोलाबारी के बीच मेजर सर्वानन ने गंभीर रूप से घायल होने पर भी दुश्मन के बंकर पर कब्जा कर लिया। भीषण लड़ाई में मेजर सर्वानन शहीद हुए और उन्हें (मरणोपरांत) वीरचक्र से सम्मानित किया गया। उनकी शहादत का पता चलने पर नायक गणेश प्रसाद (वीरचक्र, मरणोपरांत) ने अपने कंपनी कमांडर का अनुसरण करते हुए मदद आने तक दुश्मन से बंकर की रक्षा करते वीरगति को प्राप्त किया। अपने साथियों के शव निकालने गए नायक शत्रुघ्नसिंह को भी गोली लगी पर उन्होंने दुश्मन की एलएमजी पर कब्जा कर अनेक दुश्मनों को ढेर कर दिया। उन्होंने मारे गए एक पाकिस्तानी की जेब से पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सैन्य दस्तावेज हासिल कर अधिकारियों को दिए।
Keshing Cleford Nornung
वीरता और बलिदान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। 2 राजपूत राइफल्स के मेजर पद्मपणि आचार्य (महावीर चक्र, मरणोपरांत), 18 ग्रेनेडियर्स की घातक कंपनी के ले. बलवान सिंह (महावीर चक्र), लद्दाख स्कॉउट्स के मेजर सोनम वोंगचुक (महावीर चक्र), 12 जेके लाइट इंफेंट्री के ले. केशिंग क्लेफोर्ड नागारूम (महावीर चक्र, मरणोपरांत) सहित भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30,000 अधिकारी व जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया।
युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने इस युद्ध के लिए कश्मीरी आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया था, जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि पाकिस्तान इस पूरी लड़ाई में लिप्त था। यह युद्ध ऊँचाई पर लड़े जाने वाले विश्व के प्रमुख युद्धों में से एक है। सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों ही देश परमाणु हथियारों से संपन्न हैं। पर कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।
मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा-हमेशा के लिए बसी रहेंगी.......जय हिंद.जय भारत.

करगिल युद्धः एक और विजय कहानी

कारगिल युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है।
पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पार करके भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने दावा किया कि लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी। लगभग 30,000 भारतीय सैनिक और करीब 5,000 घुसपैठिए इस युद्ध में शामिल थे। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर हमला किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से पाकिस्तान को सीमा पार वापिस जाने को मजबूर किया। यह युद्ध ऊँचाई वाले इलाके पर हुआ और दोनों देशों की सेनाओं को लड़ने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। आणविक शस्त्र बनाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ यह पहला सशस्त्र संघर्ष था।
पाकिस्तान में इस युद्ध के कारण राजनैतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ गई और नवाज़ शरीफ़ की सरकार को हटाकर परवेज़ मुशर्रफ़ राष्ट्रपति बन गए। दूसरी ओर भारत में इस युद्ध के दौरान देशप्रेम का उबाल देखने को मिला और भारत की अर्थव्यवस्था को काफ़ी मजबूती मिली। भारतीय सरकार ने रक्षा बजट और बढ़ाया। इस युद्ध से प्रेरणा लेकर कई फ़िल्में बनीं जिनमें एल ओ सी कारगिल, लक्ष्य और धूप मुख्य हैं।