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बुधवार, 3 अगस्त 2011

डॉक्टर है या कसाई ? 2 मरीजों को जंगल में फेंकवाया !

इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक सरकारी अस्पताल में भर्ती दो निराश्रित मरीजों को जंगल में ले जाकर फेंकने के मामले में एक डॉक्टर सहित अस्पताल के चार कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया है। शहर के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल के डॉक्टर सोनू शर्मा, दो वार्ड ब्याव धर्मेंद्र और राजू यादव व एंबुलेंस चालक शिव निर्मल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। डॉक्टर को छोड़कर बाकी तीनों कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।
पुलिस के मुताबिक डॉक्टर के कहने पर दोनों वार्ड बॉय और एबुलेंस चालक ने दोनों निराश्रित मरीजों को अस्पताल से बाहर ले जाकर जंगल में फेंक दिया। एक मरीज को पीलिया थी जबकि दूसरे को इपीलिप्सी थी।
इलाहाबाद के पुलिस अधीक्षक (गंगापार) जय प्रकाश पांडे ने बुधवार को संवाददाताओं को बताया, "मामला संज्ञान में आने के बाद पुलिस ने दोनों मरीजों को फिर से अस्पताल में ले जाकर भर्ती कराया। उन्हें मंगलवार को एंबुलेंस से ले जाकर दोनों वार्ड बॉय शहर के बाहरी इलाके फूंसी के एक जंगल में छोड़कर भाग गए। उनकी इस करतूत को कुछ ग्रामीणों ने देख लिया और बाद में उन्होंने इसकी जानकारी पुलिस को दी।'
उधर अस्पताल के प्रिंसिपल एस.पी. सिंह ने संवाददाताओं से कहा, "मामले की जांच के आदेश दिये गये हैं। जो लोग इस अमानवीय कृत्य में शामिल पाए जाएंगे उनके खिलाफ कड़ी कारवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि अस्पताल में इस तरह की पहली घटना सामने आई है।"

राहुल गांधी के बायोडाटा में धर्म और राष्ट्रीयता का जिक्र क्यों नहीं !

भारत का एक आम नागरिक किसी भी सरकारी गैर सरकारी क्षेत्र में जब अपना परिचय प्रस्तुत करता है या उससे कहीं मांगा जाता है तो उसमें जाति,वर्ग,धर्म और राष्ट्रीयता अंकित करना अनिवार्य होता है। ऐसे में गौर से देखिए, कांग्रेस के युवराज और घोषित भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के इस सरकारी प्रोफाइल को....इसमें इन सब की कहीं कोई जिक्र नहीं है!!

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कहीं मनमोहन सरकार के लिए खतरे की घंटी न बन जाए विपक्ष के साथ ये "डील"


आखिरकार सरकार ने हमलावर विपक्ष के आगे हथियार डाल दिए। संसद में दो दिन तक हुए हंगामे के बाद सरकार ने महंगाई के मुद्दे विपक्ष से समझौता कर लिया। इस समझौते के तहत बुधवार को लोकसभा और राज्यसभा में महंगाई पर चर्चा होगी। चर्चा के बाद वोटिंग भी होगी, जिसके लिए सरकार पहले तैयार नहीं थी। सवाल है कि ये समझौता सरकार के लिए राहत की सांस लेकर आया है या खतरे की घंटी।
विपक्ष और सरकार के बीच तीन शर्तों पर समझौते
पहली शर्त- लोकसभा में महंगाई पर चर्चा
बुधवार को लोकसभा में नियम 184 के तहत महंगाई पर चर्चा होगी। नियम 184 का मतलब है बहस के बाद वोटिंग होगी और सरकार को अपने वोट जुटाने होंगे।
दूसरी शर्त- राज्यसभा में भी महंगाई पर चर्चा
बुधवार को लोकसभा में महंगाई पर चर्चा होने के बाद राज्यसभा में भी आगे जाकर महंगाई पर नियम 167 के तहत चर्चा की जाएगी। उधर लोकसभा में बुधवार को ही आतंकवाद पर नियम 176 के तहत छोटी बहस होगी।
तीसरी शर्त- लोकपाल बिल
अब तय हो गया है कि गुरुवार को संसद में लोकपाल बिल पेश किया जाएगा। पहले ये बिल बुधवार को पेश होना था।
जाहिर है विपक्ष इन मामलों में सरकार के झुकने में अपनी जीत देख रहा है। साथ ही लेफ्ट और एनडीए तृणमूल, बीएसपी और समाजवादी पार्टी को भी घेरने का मौका तलाश रहे हैं। क्योंकि ये दल संसद के बाहर तो महंगाई के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन संसद के भीतर सरकार के साथ खड़े हो जाते हैं। हालांकि बीएसपी और समाजवादी पार्टी भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर सरकार पर हमलावर हैं। लेकिन महंगाई के मुद्दे पर एनडीए और लेफ्ट दोनों साथ खड़े हैं।
साफ है सरकार संसद न चलने का ठीकरा अपने सिर नहीं फोड़ना चाहती है। लिहाजा उसने एक कदम पीछे आने का फैसला किया। लेकिन सरकार को बैकफुट पर देख विपक्ष के तेवर और आक्रामक हो गए हैं। विपक्ष की रणनीति है कि महंगाई और आतंकवाद के मुद्दे पर सरकार को घेरने के बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधा जाए। टेलीकॉम घोटाले के बाद सीएजी ने कलमाडी के मामले में भी पीएमओ का नाम लेकर विपक्ष को मजबूत हथियार थमा दिया है।

कोई बिछड़ा यार मिला दे...ओय रब्बा

मेरे दोस्तों की तो काफी लम्बी लिस्ट है, लेकिन मैं आज एक खास दोस्त के बारे में बताऊंगा जिसे मैं इस दिन बहुत मिस करता हूँ। बात १९९३-९३ की है। उस समय मैं थर्ड क्लास में गाव के सबसे अच्छे स्कूल बाल विकाश विद्यालय में पड़ता था। मेरे क्लास में लड़का - लड़की तो बहुत पढते थे। लेकिन उसमे मेरी एक खास दोस्त थी जिसका नाम था, "तन्मीर जहाँ " बड़ा अच्छा नाम था। वो गावं के थाने के बड़ा बाबु की बेटी थी। उसके नाम से ही लग रहा होगा की कोई सहजादी होगी। और सही में वो सहजादी ही थी सिर्फ देखने में ही नहीं बल्कि बात करने और सभी मामले में। दोनों साथ में खेलते कूदते थे लेकिन अचानक एक दिन पता चला की उसके पापा जी का ट्रान्सफर हो गया और वो जाने लगी, तभी तो संचार क्रांति नहीं था और न ही मेरे घर में फ़ोन था। और वो जहाँ जा रही थी उसका नंबर भी नहीं था। बस ४ साल की दोस्ती मैं हमेशा याद करता हूँ। और उसे खोजने की कोशिस करता हूँ। फसेबूक की आबादी भी इतनी बढ गयी है इसीलिए सोचा शायद वो इस पर हो इसीलिए किसी को मालूम हो उसके बारे में तो जरुर बताएं । "हैप्पी फ्रेंडशिप डे तन्नु"      
@सन्नी शरद

फ्रेंडशिप डे मनाइये जरा संभलकर

@सन्नी शरद
दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के एक पल....
हर साल भारत में फ्रेंडशिप डे (यानि कि सिर्फ और सिर्फ दोस्ती का दिन) मानाने की एक नई परम्परा का आगाज हुआ है। अब ये कहाँ तक सही है और कहाँ तक गलत है, ये बहस का मुद्दा हो सकता है। हर कोई इसे अपने अंदाज में देखता है और इसके रंग में मगन हो जाता है। कोई इसे अच्छा कहता है तो कोई लाठी और डंडा लेकर इसका विरोध करता है।
आज के इस गला काट प्रतियोगिता के युग में दोस्ती का ये जो नया संस्करण हुआ है मुझे तो बड़ा भाता है। इस प्रतियोगितावादी जिंदगी में तिल और तंडुल के चक्कर में आज हम सभी पिसते चले जा रहे हैं और अपनों से दूर चले जा रहे हैं। रात को देर तक जागना और सुबह होते ही बॉस का फ़ोन आना और बिना नहाये ऑफिस भागना। बस आज हमारी जिंदगी यहीं तक सीमीत हो गयी है। तनाव, ब्लड प्रेसर बढ रहा है। सुबह का नास्ता दोपहर को और दोपहर का रात को भी करने की भी फुर्सत नहीं मिल रही है. ज्यादातर लोग ६० से पहले ही जिंदगी से रिटाएर हो जा रहे हैं। ऐसी जिंदगी में यदि लोग दो पल खुशी का मना ले तो इसमें क्या हर्ज़ है।
शाहरुख़ खान ने एक फिल्म में कहा है की एक लड़का और लड़की कभी दोस्त हो ही नहीं सकते हैं. और अब लोग भी कहते हैं फ्रेंडशिप का मतलब अब वल्गर हो गया है। ये अब सिर्फ लडको और लड़कियों में ही जयादा होता है। लेकिन ये गलत बात है। आज भी अपने आप में आधी दुनिया को समाने वाला फेसबुक इस बात का गवाह है की दोस्तों के मन में दोस्ती अभी जिन्दा है. फेसबुक पर कई ऐसी बात पड़ने को मिलेगी जिसमे कोई अपनी जिंदगी में कुछ हांसिल करके अपने बचपन के दोस्त को खोज रहा है।
दोस्त कोई भी किसी का हो सकता है। यहाँ तक आज एक पिता जी भी अपने बेटे के साथ दोस्त जैसा वैव्हार रखते हैं। ताकि उनका बेटा क्या कर रहा है ये उन्हें पता चल सके।
मेरी नज़र में फ्रेंडशिप डे मनाने के फायदे:
·                     दोस्त को समय देने का एकलौता पर्व।
·                     दोस्तों को याद करने का अच्छा मौका।
·                     दोस्तों के साथ समय बिताने का अच्छा बहाना।
·                     उन दोस्तों को भी याद करने का अच्छा मौका जिनसे छोटी - मोटी बात पर जगडा हुआ हो।
·                     इसमें दोस्त अपने दोस्त को कार्ड और फूल देते हैं, ऐसे में ऐसे में कार्ड और फूल वाले को 
     रोजगार मिलता है।
·                     किसी कैंटीन या ढाबे में गए तो उस दुकान वाले को फायदा।
·                     भूले बिछड़े दोस्तों को याद करने और उन्हें खोजने का अच्छा मौका।
·                     ऑफिस से छुट्टी लेने का एक अच्छा बहाना।
·                     इसी बहाने कई और नए दोस्त बन जाती हैं।
·                     सभी ढाबे और पार्क वाले का बल्ले बल्ले।
फ्रेंडशिप डे मनाने की हानियाँ: 
·                     अपनी संस्कृति को भूलते जाना और पश्चिमी संस्कृति को अपनाना।
·                     इम्पोर्टेड गिफ्ट दोस्तों को देना। न की देश में गरीबों द्वारा बनाया गया गिफ्ट देना।
·                     लडको द्वारा लड़की का इस दिन का गलत फायदा उठाना।
·                     लड़की के लिए आज का दिन बुरा क्यूंकि घरवाले घर से निकलने नहीं देते हैं।
निष्कर्ष:

दोस्ती के लगभग सभी पहलु को मैंने आज के परिदृश को देखते हुए दर्शाया है। वैसे मुझे ये अच्छा लगता है क्यूंकि इस पर्व में सभी दोस्त एक जगह मिल कर मस्ती करते हैं। और अपना हाले दिल एक दुसरे से बायाँ करते हैं।

रविवार, 31 जुलाई 2011

सरकारी दलालों के हाथ कलप-कलप के मर रहे हैं हमारे अन्नदाता

हमारे देश में संविधान की कोई अहमियत है या नहीं। अन्न उगाने वाले हमारे देश के  मूल निर्माता किसान आए दिन आत्म हत्या कर रहे है..सिर्फ इसलिए कि उन्हें अपनी लागत के बराबर भी मूल्य नहीं मिल रहा । उनकी मेहनत की कमाई खा रहे हैं, सरकार और उसके पूंजीपति दलाल............

!!!!भारत को कहां ले जाना चाहती है ये अधकचरी महिलाएं!!!!


 
एक महीने की तैयारी के बाद दिल्ली के युवाओं ने जंतर मंतर से स्लट वॉक (बेशर्मी मोर्चा) निकालकर समाज को महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलने का संदेश दिया। रविवार की सुबह साढ़े दस बजे  जंतर मंतर से शुरू हुआ यह मोर्चा वापस जंतर मंतर पर ही लौट आया। यहां नुक्कड़  नाटक के जरिए महिलाओं को कपड़े पहनने और काम करने की आज़ादी की मांग की गई। इस कार्यक्रम में शामिल महिलाओं और लड़कियों का कहना है कि जंतर मंतर से महिलाओं के हक और सम्मान के लिए आवाज बुलंद हुई है। उनके मुताबिक स्लट वॉक यानी बेशर्मी मोर्चा समाज की मानसिकता बदलने की लड़ाई की शुरूआत भर है।
स्लट वॉक की आयोजक उमंग सबरवाल ने कहा है कि हमारी कोशिश जरूर रंग लाएगी। वहीं, बॉलीवुड कलाकार नफीसा अली  ने कहा है कि सरकार को महिलाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नेताओं को महिलाओं के प्रति बयान देते समय बहुत संवेदनशील होना चाहिए।
जंतर मंतर पर स्मिता ग्रुप ने नुक्कड़ नाटक का मंचन कर महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाई। स्लट वॉक करने  वाली लड़कियों ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता की आलोचना की। विरोध प्रदर्शन करने वाली लड़कियों ने शीला दीक्षित के उस बयान की आलोचना की जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। वहीं, बीके गुप्ता के उस बयान पर भी स्लट वॉक कर रही लड़कियों ने कड़ा ऐतराज जताया जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध में कमी आई है। महिलाओं ने कहा कि जिस दिन कमिश्नर ने यह बयान दिया था, उसी दिन महिलाओं से रेप की घटना सामने आई थी। भारत में अपने तरीके का यह पहला बड़ा अनोखा विरोध प्रदर्शन है जो महिलाओं के पहनावे की आजादी के समर्थन में चलाया जा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के साथ ही बड़ी संख्या में दिल्ली की महिलाओं ने इसे अपना समर्थन दिया।
क्या है स्लट वॉक

स्लट वॉक जिसे हिंदी में बेशर्मी मोर्चा नाम दिया है, महिलाओं के हक और सम्मान की लड़ाई है। आयोजकों के मुताबिक, स्लट वॉक उस मानसिकता के खिलाफ जंग का ऐलान है जो समझते हैं कि लड़कियां अगर मॉडर्न या छोटे कपड़े पहन रही हैं तो वे छेड़खानी के लिए आमंत्रित कर रही हैं। पीड़ित पर ही आरोप लगाने और दोषी को कसूरवार ठहराने की मानसिकता बदलने की लड़ाई है यह। यह वॉक लोगों को अहसास दिलाने के लिए है कि लड़कियों के साथ अत्याचार और भेदभाव हो रहा है और इसे खत्म करने की जरूरत है।

!!! कानून की कौन सी किताब पढ़ी है दिल्ली हाई कोर्ट के इस जज ने !!!

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि रिश्ते में भाई-बहन लगने वाले हिंदू युवक-युवती ईसाई धर्म अपनाकर आपस में शादी कर सकते हैं।
अदालत ने यह फैसला देते हुए एक रिटायर्ड जज की याचिका खारिज कर दी। रिटायर्ड जज ने अपने मैजिस्ट्रेट बेटे के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिसने धर्म बदलने के बाद अपने मामा की बेटी से शादी कर ली थी।
जस्टिस सुरेश कैत ने शादी की वैधता को कायम रखते हुए कहा, 'प्रतिवादियों (दंपती) का धर्म परिवर्तन भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम की धारा तीन के तहत उचित है। इसलिए इनकी शादी ऐसे संबंध के तहत नहीं आती, जो हिंदू विवाह अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है।'
अपने बेटे के खिलाफ मामला दर्ज कराने पर पिता को फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा, 'इस तरह की सोच नई पीढ़ी की व्यापक सोच को खत्म करती है और कई बार इसका नतीजा झूठी शान के लिए की जाने वाली हत्याओं के रूप में दिखता है।'
अदालत ने याचिकाकर्ता ओ पी गोगने पर 'विचार न करने योग्य मामला' दर्ज करने पर 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। (नभाटा)

!!! भारतीय बाबाओं का उद्योगपति घराना’!!!

@अनुभव भारतीय
साईं जैसे संत का प्रादुर्भाव एक गरीब परिवार में हुआ था। साईं के सादे जीवन को लोगों ने अपने जीवन में कितना उतारा कहना मुश्किल है। लेकिन, तब के शिरडी के सांई बाबा जितना गरीब थे, आज के साईबाबा उतने ही अमीर है। जिस साईं ने जीवन भर एक कुटिया में, लकड़ी का पीढ़ा और जमीन पर सोकर कर बिता दिया, आज उन्हीं साई के बैठने के लिए हीरों से जड़ा चॉदी और सोने का सिंहासन और मुकूट है। चढ़ावा भी करोड़ो में चढ़ता है। उनके भक्त दुनिया के विभिन्न देशों में है। भारत में भी लोगों का भक्ति भाव साई की तरफ झुकता देखकर ,अन्य शहरों के पंडितों और पुजारियों ने अपने-अपने मंदिरों में, साईं जैसे गरीब संत को आरक्षण देकर उनकी मुर्ती स्थापित करने लगे हैं। ताकि, भक्तों के जेब से निकलने वाला दान और चढ़ावा किसी अन्य साई मंदिर में जाकर न चढ़ जाय और मंदिर के पुजारी भक्तों का मुंह देखता रह जाय। यह मंदिर के पुजारियों और मठों के मठाधीशों का ही खेल है कि, साई जैसे गरीब संत, विलासिता की वस्तुओं से नवाजे जा रहे हैं। उनके संत स्वभाव को नकार कर उन्हें विलासी बना दिया गया। भगवान, संत और साई की भक्ति और आदर सत्कार कैसे की जाती है , कहना मुश्किल है? लेकिन, आज पंडितो ने इसके लिए अपना अलग-अलग मापदंड तय कर लिया है। यहाँ तक कि केदारनाथ, बद्रीनाथ, तिरूपति, और जग्गनाथपुरी जैसे मंदिरों में भगवान के दर्शन करने के लिए पंडितों को फीस दी जाती है। भगवान प्रसन्न हो या न हो, लेकिन पंडित जरूर प्रसन्न हो जाते है। भक्तों की आस्था को ठेस न पहुंचे और पुजारी नाराज न हो, इसलिए टीवी चैनल का कैमरा इस ओर कभी नहीं घुमा और इन चीजों को कभी दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस ओर कैमरा जब भी घूमा आस्था की भावना लेकर । ताकि चैनल की टीआरपी बरकरार रहे।
शनि का साढ़े साती, राहू-केतु, सूर्य-चंद्रमा और ग्रहों के दोष, दशा और दिशाओं को बताने वाले बाबाओं को कैमरे के सामने बैठा देख, समाज बड़े आदर और सम्मान के साथ देखता है। अपनी समस्यों के समाधान के लिए इनके कॉरपोरेट फोन पर संपंर्क साधता है और बदले में मोटी रकम अपने बैंक अकॉन्ट में डलवाने के लिए कहता है। लाईव या रिर्कोडेड प्रोग्राम के समय न केवल टेलीविजन की टीआरपी बढ़ रही होती है, बल्कि, बाबा का भी प्रमोशन और विज्ञापन हो रहा होता है। प्रायोजित या रेकॉर्डेड कार्यक्रम में बाबा से आधा घंटा या 20 मिनट के स्लॉट के हिसाब से चैनल वालों को फीस दी जाती है।
मार्च 2010 में, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में कृपालू जी महराज के आश्रम में भगदड़ से 63 लोगों की मौत हो गई थी। आयोजन था, कृपालू जी महराज की पत्नी की बरसी पर एक थाली, एक रुमाल, 20 रुपया नकद और प्रसाद में एक लड्डू बांटने का। कृपालू जी की सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की चाहत में बेचारे 63 गरीब भक्तों को अपनी जान गंवानी पड़ी। कृपालू महराज के उपर कार्रवाई करने का नतीजा तो सिफ़र रहा। उल्टे उनकी और टीवी चैनलो की टीआरपी उस दिन जरुर हाई हो गई, जिस दिन गरीब,मासूम 63 भक्तों ने अपनी जान गंवाई थी।
सड़क के फुटपाथ से उठकर चैनल के स्टूडियों से लाइव टेलिकास्ट करने वाला बाबाओं का आज एक घराना बन गया है,- ‘बाबाओं का उद्योगपति घराना’।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

देश में पहली समलैंगिक शादी को कोर्ट की मुहर

देश में पहली समलैंगिक शादी शुक्रवार को गुडगांव में रचाई गई। उत्तरप्रदेश के बागपत जिले की सविता और बीना की पहली लेस्बियन शादी को कोर्ट ने अनुमति दे दी तथा इन्हें पुलिस प्रोटक्शन भी दी। सविता और बीना की बचपन से ही गहरी दोस्ती थी।

दोनों ने स्कूल और कॉलेज साथ-साथ किया। सविता और बीना ने गुडगांव भागकर आई तथा जिला अदालत में एक अर्जी दी। जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह फैसला लिया है। गौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि >समलैंगिक सम्बन्ध रखना कोई अपराध नहीं है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विमल कुमार ने दोनों के बयान दर्ज कर लिए है। बयान में बताया कि सविता और बीना ने 22 जुलई 2011 को अपनी मर्जी से शादी की थी। शादी के लिए उनके ऊपर किसी का दबाव नहीं है और न ही किसी लालच के कारण वे ऎसा कर रही है। बीना और सविता बचपन की दोस्त है। यह दोस्त और आगे बढ गई और वे लेस्बियन बन गई।

केन्द्र सरकार के साथ चल रहा है देवासुर संग्रामः बाबा रामदेव

प्रसिद्ध योगगुरु बाबा रामदेव ने आज अपने चिर-परिचित अंदाज में केन्द्र सरकार की कड़ी आलोचना की और कहा कि  केन्द्र और उनके बीच देवासुर संग्राम चल रहा है, जिसमें आखिरकार विजय उनकी ही होगी।
अपने करीबी सहयोगी बालकृष्ण को उत्तराखंड उच्च न्यायालय से मिली राहत के बाद योगगुरु रामदेव ने कहा कि जो लोग राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगे हैं, उनको नष्ट करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि बालकृष्ण आगामी चार अगस्त को सीबीआई के सामने पेश होंगे और उसके जांच कार्य में पूरा सहयोग देंगे।
बाबा रामदेव ने बालकृष्ण की संभावित गिरफ्तारी पर रोक लगाने सम्बन्धी आदेश दिए जाने पर उच्च न्यायालय को धन्यवाद दिया और कहा कि केन्द्र और उनके बीच जारी देवासुर संग्राम में वह और उनके समर्थक विजयश्री हासिल करेंगे। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा राष्ट्र निर्माण के लिए चलाए जा रहे कार्यों में असुर बाधा पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

अब कहां जाएंगें ये दृष्टिहीन बच्चें

एक दर्जन दृष्टिहीन बच्चों को बीते रविवार को सिर्फ इसलिए एसबीआई की परीक्षा से वंचित कर दिया गया क्योंकि उनके परीक्षा की कॉपी लिखने वाले 'राईटर' अपने साथ मार्क्स शीट लेकर नहीं आए थे। जबकि परीक्षा के नियमावली में इस बात का उल्लेख नहीं है। अब ये बच्चे जो गरीब परिवार से आते हैं, मीडिया के सामने खुल कर भी नहीं आ सकते क्योंकि उन्हें अपने भविष्य की चिंता है। अब ये बच्चे क्या करें?
यह घटना बीते रविवार की दिल्ली विकासपुरी में एक स्कूल की है, घटना के बाद पीड़ित छात्र पुलिस के पास एफ आई आर के लिए भी गए,लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनका साथ नहीं दिया ।

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

अन्ना टीम के जन लोकपाल विधेयक पर सियासी दलों का मंथन


लोकपाल‍ बिल को लेकर देश की सियासी पार्टियों के बीच विचार-मंथन होना है. इससे पहले मजबूत लोकपाल के गठन को लेकर समाजसेवी अन्‍ना हजारे ने अपनी टीम के स्‍तर से देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से मुलाकात कर राय ली और अपने पक्ष से अवगत कराया.
वैसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में लोकपाल विधेयक पर साझा दृष्टिकोण आने की कम ही संभावना है. दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और वामदलों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. जानिए किस पार्टी ने अन्‍ना को दिया किस तरह का आश्‍वासन...
लोकपाल पर भाजपा का रुख
गांधीवादी अन्ना हज़ारे और उनके साथी कार्यकर्ताओं ने भाजपा के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की, जिसमें समाज के सदस्यों को प्रभावी और सशक्त लोकपाल के मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दल के समर्थन का आश्वासन मिला. इस बैठक के बाद भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा, ‘‘हमने हज़ारे पक्ष को आश्वासन दिया है कि भाजपा प्रभावी और मजबूत लोकपाल के गठन की उनकी मांग का समर्थन करेगी. हज़ारे पक्ष से मिलने के बाद लोकपाल के मुद्दे पर पार्टी का औपचारिक रुख तय करने के लिये भाजपा के शीर्ष नेताओं ने अलग से बैठक की.’’
जदयू की राय
अन्‍ना हज़ारे और उनके साथी कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और मनीष सिसौदिया ने बिहार के मुख्यमंत्री और जद-यू के वरिष्ठ नेता नीतीश से मुलाकात की थी. करीब 40 मिनट चली इस मुलाकात के बाद नीतीश ने संकेत दिया कि वे हज़ारे पक्ष के सुझावों के आधार पर अपने राज्य में लोकायुक्त का गठन करना चाहते हैं. नीतीश ने कहा, ‘‘हमने अभी हज़ारे पक्ष के मसौदे का विस्तृत अध्ययन नहीं किया है. मसौदे पर गौर करने, अपनी पार्टी (जद-यू) के भीतर चर्चा करने और सहयोगी दलों के साथ बातचीत करने के बाद ही हम लोकपाल के मुद्दे पर अपना रुख तय करेंगे.’’
सत्ताधारी कांग्रेस की राय
अन्‍ना हजारे ने कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकत कर कांग्रेस से भी मतभेद दूर करना चाहा. इसके बावजूद मुख्य पांच ऐसे मुद्दे हैं, जिनपर सरकार और अन्ना की टीम के बीच पेंच फंसा है:
पहला मुद्दा
: लोकपाल चयन समिति के सदस्य
सिविल सोसायटी चाहती है कि लोकपाल चुनने वाली समिति के 11 सदस्यों में पीएम, नेता प्रतिपक्ष, और एक वरिष्ठ मंत्री के अलावा बाकी गैर राजनीतिक लोग हों. जिसमें सीएजी और सीवीसी जैसे लोग भी शामिल हों. जबकि सरकार चाहती है कि चयन समिति में ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक लोग हों, सीवीसी और सीएजी तो कतई नहीं.
दूसरा मुद्दा: लोकपाल के दायरे में पीएम?
सिविल सोसायटी पीएम को भी लोकपाल के दायरे में चाहती है जबकि सरकार इसमें रिटायरमेंट के बाद की शर्त जोड़ रही है.
तीसरा मुद्दा:लोकपाल को हटाने की प्रक्रिया
सिविल सोसायटी ये हक आम आदमी को भी देना चाहती है कि वो सुप्रीमकोर्ट में मुकदमा कर लोकपाल को हटवा दे. जबकि सरकार पूरी तरह इसे सरकार के कब्जे में रखने चाहती है.
चौथा मुद्दा:लोकपाल का दायरा
सिविल सोसायटी चाहती है कि पीएम, न्यायपालिका, सरकारी कर्मचारी, सांसद, मंत्री, सैनिक खरीददारी, नौकरशाह लोकपाल के दायरे में हों जबकि सरकार नौकरशाह, पद पर पीएम, उच्च न्यायपालिका सांसदों को इसके दायरे में नहीं रखना चाहती.
पांचवा मुद्दा:भ्रष्टाचार की सजा
सिविल सोसायटी चाहती है कि भ्रष्टाचार की सजा उम्रकैद हो जबकि सरकार 10 साल से ज्यादा की सजा के लिए तैयार नहीं.
माकपा की सोच
सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से पहले अपना पक्ष मजबूत करने की कवायद में गांधीवादी अन्ना हज़ारे समर्थकों ने माकपा महासचिव प्रकाश करात से मुलाकात की. आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल और पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने करात से माकपा मुख्यालय में मुलाकात की.इसमें प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के बारे में समाज के सदस्यों के रख से दोनों नेताओं को अवगत कराया गया. माकपा के औपचारिक रुख का खुलासा सर्वदलीय बैठक में ही हो सकेगा.
राष्ट्रीय लोक दल की राय
अन्‍ना हजारे ने राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख अजित सिंह से मुलाकात की. इसमें प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के बारे में समाज के सदस्यों के रुख से दोनों नेताओं को अवगत कराया गया. रालोद प्रमुख ने कहा कि हज़ारे के कारण ही देश में भ्रष्टाचार के खिलाप लोगों को जागरूक बनाया जा सका है. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी हज़ारे पक्ष के मसौदे का मोटे तौर पर समर्थन करती है.
भाकपा का मत अभी तय नहीं
अन्‍ना हजारे पक्ष ने भाकपा नेता ए. बी. वर्धन से मुलाकात कर उनके विचार मांगे. भाकपा महासचिव ए.बी. वर्धन ने कहा कि उनकी पार्टी प्रस्तावित विधेयक पर चर्चा में भाग लेने के बारे में विचार कर रही है. भाकपा नेता ने कहा
, ‘‘हम सोच रहे हैं. हमारी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस पर फैसला करेगा.’’

'खाप' के सच से डर रहा है हरियाणा का 'खाप'

ऑनर किलिंग उजागर करती फिल्म 'खाप'
अजय सिन्हा के निर्देशन में बनीं फिल्म खाप में ऐसा क्या है जिसने पूरे हरियाणा को हिला कर रख दिया है। अजय सिन्हा ने तो सिने दर्शकों के लिए एक मनोरंजन फिल्म बनायी है जिसमें, डांस है, ड्रामा है, रोमांस है, एक्शन है। इसमें  हर हिंदी फिल्म की तरह एक लवस्टोरी को दिखाया गया है जिसे समाज की स्वीकृति नहीं मिलती है और उस स्टोरी का दर्दनाक अंत हो जाता है।  
ये तो हर प्रेम कहानी   में होता है। 
पिछले कई दशकों से ये ही होता आ रहा है लेकिन अजय सिन्हा की फिल्म में ऐसा क्या है जिससे हरियाणा की खाप पंचायत एक दम से उखड़ गयी है। और वो इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की बात कर रही है।  
ये बातें ये इशारा करती हैं कि कहीं ना कहीं खाप को भी इस बात का अंदेशा है कि उसके फैसले कहीं ना कहीं गलत होते हैं। उसके तुगलकी फरमान से लोग को काफी तकलीफ होती है। जिसके कारण वो एड़ी चोटी का दम लगा रही है इस फिल्म को रूकवाने के लिए। उसे कहीं ना कहीं ये डर सता रहा है कि खाप फिल्म से उसका वो घिनौना सच लोगों के सामने ना आ जाये जिसे खाप पंचायत सही मानती है।और लोग विद्रोह पर उतर आयें। 
गौरतलब है कि पिछले साल के रिकार्ड के
मुताबिक हरियाणा में सबसे ज्यादा ऑनर किलिंग के मामले सामने आये है। जिसके लिए काफी हद तक खाप पंचायत के तुगलकी फरमान जिम्मेदार है। लेकिन खाप पर इन बातों का कोई असर नहीं होता है।
आपको बता दें कि इस शुक्रवार यानी
कल अजय सिन्हा की फिल्म खाप प्रदर्शित हो रही है। ऑनर किलिंग के विषय पर आधारित फिल्म खाप रुढ़िवादी पीढ़ियों द्वारा बनाई गयी एक प्रथा का विरोध करती है। फिल्म में दो प्रेमी दिखाये गये हैं। दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं।लेकिन खाप पंचायत उन्हें इसकी इजाजत नहीं देती।

अमिताभ बच्चन: बॉलीवुड के सबसे सफल अभिनेता

अमिताभ बच्चन (जन्म-11 अक्तूबर) बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय अभिनेता है।
1970 के दशक के दौरान उन्होंने बड़ी लोकप्रियता प्राप्त की और तबसे भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे प्रमुख व्यक्तित्व बन गए हैं।
बच्चन ने अपने कैरियर में कई पुरस्कार जीते हैं, जिनमें तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और बारह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार शामिल है। उनके नाम सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता फिल्मफेयर अवार्ड का रिकार्ड है। अभिनय के अलावा बच्चन ने पार्श्वगायक, फिल्म निर्माता और टीवी प्रस्तोता और भारतीय संसद के एक निर्वाचित सदस्य के रूप में 1984 से 1987 तक भूमिका की हैं।
बच्चन का विवाह अभिनेत्री जया भादुड़ी से हुआ है। इनके दो संतान हैं, श्वेता नंदा और अभिषेक बच्चन, जो एक अभिनेता भी हैं और जिनका विवाह  विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय से हुआ है।
इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, में जन्मे अमिताभ बच्चन हिंदू कायस्थ परिवार से संबंध रखते हैं। उनके पिता, डॉ। हरिवंश राय बच्चन प्रसिद्ध हिन्दी कवि थे, जबकि उनकी मां तेजी बच्चन कराची के सिख परिवार से संबंध रखती थीं (अब पाकिस्तान) में। आरंभ में बच्चन का नाम इंकलाब रखा गया था। जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रयोग में किए गए प्रेरित वाक्यांश इंकलाब जिंदाबाद, से लिया गया था, लेकिन बाद में इनका फिर से अमिताभ नाम रख दिया गया जिसका अर्थ है, ऐसा प्रकाश जो कभी नहीं बुझेगा। यद्यपि इनका अंतिम नाम श्रीवास्तव था। फिर भी इनके पिता ने इस उपनाम को अपने कृतियों को प्रकाशित करने वाले बच्चन नाम से उद्धृत किया। यह उनका अंतिम नाम ही है,जिसके साथ उन्होंने फिल्मों में एवं सभी सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए उपयोग किया अब यह उनके परिवार के समस्त सदस्यों का उपनाम बन गया है।
अमिताभ, हरिवंश राय बच्चन के दो बेटो में सबसे बड़े हैं । उनके दूसरे बेटे का नाम अजिताभ है। इनकी माता की थिएटर में गहरी रुचि थी और उन्हें फिल्म में भी रोल की पेशकश की गई थी,किंतु इन्होंने गृहणि बनना ही पसंद किया। अमिताभ के कैरियर के चुनाव में इनकी माता का भी कुछ हिस्सा था,क्योंकि वे हमेशा इस बात पर भी जोर देती थी कि उन्हें सेंटर स्टेज को अपना कैरियर बनाना चाहिए। बच्चन के पिता का देहांत 2003 में हो गया था जबकि उनकी माता की मृत्यु 21 दिसंबर 2007 को हुई थीं।
बच्चन ने दो बार एम। ए। की उपाधि ग्रहण की है। मास्टर ऑफ आर्ट्स (स्नातकोत्तर) इन्होंने इलाहाबाद के ज्ञान प्रबोधिनी और बॉयज़ हाई स्कूल (बीएचएस) तथा उसके बाद नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में पढाई की जहां कला संकाय में प्रवेश दिलाया गया। उन्होंने बाद अध्ययन करने के लिए ये दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज चले गए जहां इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपनी आयु के 20 के दशक में बच्चन ने अभियन में अपना कैरियर आजमाने के लिए कोलकता की एक शिपिंग फर्म बर्ड एंड कंपनी में किराया ब्रोकर की नौकरी छोड़ दी।
3 जून, 1973 को इन्होंने बंगाली संस्कार के अनुसार अभिनेत्री जया भादुड़ी से विवाह कर लिया। इस दंपती के दो बच्चों: बेटी श्वेता और पुत्र अभिषेक पैदा हुए।
कैरियरःआरंभिक कार्य १९६९ -१९७२
अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में अपने कैरियर की शुरूआत ख्वाज़ा अहमद अब्बास  के निर्देशन में बनी सात हिंदुस्तानी, के सात कलाकारों में एक कलाकार के रूप में की। उत्पल दत्त, मधु और जलाल आगा जैसे कलाकारों के सामने अभिनय फ़िल्म ने वित्तीय सफ़लता प्राप्त नहीं की पर बच्चन ने अपनी पहली फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ नवागंतुक का पुरूस्कार जीता। इस सफल व्यावसायिक और समीक्षित फिल्म के बाद उनकी एक और आनंद ( 1971) नामक फिल्म आई जिसमें उन्होंने उस समय के लोकप्रिय कलाकार राजेश खन्ना जैसे कलाकार के साथ काम किया था। डॉ; भास्कर बनर्जी की भूमिका करने वाले बच्चन ने कैंसर के एक रोगी का उपचार किया जिसमें उनके पास जीवन के प्रति वेबकूफी और देश की वास्तविकता के प्रति उसके द़ष्टिकोण के कारण उसे अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद अमिताभ ने (1971) में बनी परवाना में एक मायूस प्रेमी की भूमिका निभाई जिसमें इसके साथी कलाकारों में नवीन निश्चल, योगिता बाली और ओम प्रकाश थे और इन्हें खलनायक के रूप में फिल्माना अपने आप में बहुत कम देखने को मिलने जैसी भूमिका थी। इसके बाद उनकी कई फिल्में आई जो बॉक्स ऑफिस पर उतनी सफल नहीं हो पाई जिनमें रेशमा और शेरा (1971) भी शामिल थी और उन दिनों इन्होंने गुड्डी फिल्म में मेहमान कलाकार की भूमिका निभाई थी। इनके साथ इनकी पत्नी जया भादुड़ी के साथ धर्मेन्द्र भी थे। अपनी जबरदस्त आवाज के लिए जाने जाने वाले अमिताभ बच्चन ने अपने कैरियर के प्रारंभ में ही उन्होंने बावर्ची फिल्म के कुछ भाग का बाद में वर्णन किया। १९७२ में निर्देशित एस। रामनाथन द्वारा निर्देशित कामेडी फिल्म बॉम्बे टू गोवा में भूमिका निभाई। इन्होंने अरूणा ईरानी, महमूद, अनवर अली और नासिर हुसैन जैसे कलाकारों के साथ कार्य किया है। अपने संघर्ष के दिनों में वे सात वर्ष की लंबी अवधि तक अभिनेता, निर्देशक एवं हास्य अभिनय के बादशाह महमूद साहब के घर में रूके रहे।
स्टारडम की ओर उत्थान 1973-1983
1973 में जब प्रकाश मेहरा ने इन्हें अपनी फिल्म जंजीर  में इंस्पेक्टर विजय खन्ना की भूमिका के रूप में अवसर दिया तो यहीं से इनके कैरियर में प्रगति का नया मोड़ आया। यह फ़िल्म इससे पूर्व के रोमांस भरे सार के प्रति कटाक्ष था जिसने अमिताभ बच्चन को एक नई भूमिका एंग्री यंगमैन में देखा जो बालीवुड के एक्शन हीरो बन गए थे, यही वह प्रतिष्‍ठा थी जिसे बाद में इन्हें अपनी फिल्मों में हासिल करते हुए उसका अनुसरण करना था। बॉक्स ऑफिस पर सफलता पाने वाले एक जबरदस्त अभिनेता के रूप में यह उनकी पहली फिल्म थी, जिसने उन्हें सर्वश्रेष्‍ठ पुरूष कलाकार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए मनोनीत करवाया। 1973 ही वह साल था जब इन्होंने ३ जून को जया से विवाह किया और इसी समय ये दोनों न केवल जंजीर में बल्कि एक साथ कई फिल्मों में दिखाई दिए जैसे अभिमान जो इनकी शादी के केवल एक मास बाद ही रिलीज हो गई थी। बाद में हृषिकेश मुखर्जी के निदेर्शन तथा बीरेश चटर्जी द्वारा लिखित नमक हराम  फिल्म में विक्रम की भूमिका मिली जिसमें दोस्ती के सार को प्रदर्शित किया गया था। राजेश खन्ना और रेखा के विपरीत इनकी सहायक भूमिका में इन्हें बेहद सराहा गया और इन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया।
1974 की सबसे बड़ी फिल्म रोटी कपड़ा और मकान में सहायक कलाकार की भूमिका करने के बाद बच्चन ने बहुत सी फिल्मों में कई बार मेहमान कलाकार की भूमिका निभाई जैसे कुंवारा बाप और दोस्त। मनोज कुमार द्वारा निदेशित और लिखित फ़िल्म जिसमें दमन और वित्तीय एवं भावनात्मक संघर्षों के समक्ष भी ईमानदारी का चित्रण किया गया था, वास्तव में आलोचकों एवं व्यापार की दृष्टि से एक सफल फ़िल्म थी और इसमें सह कलाकार की भूमिका में अमिताभ के साथी के रूप में कुमार स्वयं और शशि कपूर एवं जीनत अमान थीं। बच्चन ने 6दिसंबर 1974 को रिलीज मजबूर फिल्म में अग्रणी भूमिका निभाई यह फिल्म हालीवुड फिल्म जिगजेग की नकल कर बनाई थी जिसमें जार्ज कैनेडी अभिनेता थे, किंतु बॉक्स ऑफिस पर यह कुछ खास नहीं कर सकी और 1975 में इन्होंने हास्य फिल्म चुपके चुपके, से लेकर अपराध पर बनी फिल्म फरार और रोमांस फिल्म मिली में अपने अभिनय के जौहर दिखाए। तथापि, 1975 का वर्ष ऐसा वर्ष था जिसमें इन्होंने दो फिल्मों में भूमिकाएं की और जिन्हें हिंदी सिनेमा जगत में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इन्होंने यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म दीवार में मुख्‍य कलाकार की भूमिका की जिसमें इनके साथ शशि कपूर, निरूपा राय और नीतू सिंह थीं और इस फिल्म ने इन्हें सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार दिलवाया। 1975 में यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रहकर चौथे  स्थान पर रही और इंडियाटाइम्स की मूवियों में बॉलीवुड की हर हाल में देखने योग्य शीर्ष 25 फिल्मों  में भी नाम आया। 15अगस्त, 1975 को रिलीज शोले ( अर्थ आग  है और भारत में किसी भी समय की सबसे ज्यादा आय अर्जित करने वाली फिल्‍म बन गई है जिसने 2,36,45,00000 रू०  कमाए जो मुद्रास्फीति को समायोजित करने के बाद 60 मिलियन अमरीकी डालर के बराबर हैं। बच्चन ने इंडस्ट्री के कुछ शीर्ष के कलाकारों जैसे धर्मेन्‍द्र, हेमा मालिनी, संजीव कुमार, जया बच्चन और अमजद खान के साथ जयदेव की भूमिका अदा की थी। 1999 में बीबीसी इंडिया ने इस फिल्म को शताब्दी की फिल्म का नाम दिया और दीवार की तरह इसे इंडियाटाइम्‍ज़ मूवियों में बालीवुड की शीर्ष 25 फिल्‍मों में शामिल किया। उसी साल 50वें वार्षिक फिल्म फेयर पुरस्कार के निर्णायकों ने एक विशेष पुरस्कार दिया जिसका नाम 50 सालों की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म फिल्मफेयर पुरूस्कार था। बॉक्स ऑफिस पर शोले जैसी फिल्मों की जबरदस्त सफलता के बाद बच्चन ने अब तक अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया था और 1976 से 1984 तक उन्हें अनेक सर्वश्रेष्ठ कलाकार वाले फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और अन्य पुरस्कार एवं ख्याति मिली। हालांकि शोले जैसी फिल्मों ने बालीवुड में उसके लिए पहले से ही महान एक्शन नायक का दर्जा पक्का कर दिया था, फिर भी बच्चन ने बताया कि वे दूसरी भूमिकाओं में भी स्वयं को ढाल लेते हैं और रोमांस फिल्मों में भी अग्रणी भूमिका कर लेते हैं जैसे कभी कभी (1976) और कामेडी फिल्मों जैसे अमर अकबर एन्थनी (1977) और इससे पहले भी चुपके चुपके (1975) में काम कर चुके हैं। 1976 में इन्हें यश चोपड़ा ने अपनी दूसरी फिल्म कभी कभी में साइन कर लिया यह और एक रोमांस की फिल्म थी, जिसमें बच्चन ने एक अमित मल्‍होत्रा के नाम वाले युवा कवि की भूमिका निभाई थी जिसे राखी गुलजार द्वारा निभाई गई पूजा नामक एक युवा लड़की से प्रेम हो जाता है। इस बातचीत के भावनात्मक जोश और कोमलता के विषय अमिताभ की कुछ पहले की एक्शन फिल्मों तथा जिन्हें वे बाद में करने वाले थे की तुलना में प्रत्यक्ष कटाक्ष किया। इस फिल्‍म ने इन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामित किया और बॉक्स ऑफिस पर यह एक सफल फिल्म थी। 1977 में इन्होंने अमर अकबर एन्थनी में अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। इस फिल्म में इन्होंने विनोद खन्ना और ऋषि कपूर के साथ एनथॉनी गॉन्सॉलनेज़ के नाम से तीसरी अग्रणी भूमिका की थी। 1978 संभवत: इनके जीवन का सर्वाधिक प्रशेषनीय वर्ष रहा और भारत में उस समय की सबसे अधिक आय अर्जित करने वाली चार फिल्मों में इन्होंने स्टार कलाकार की भूमिका निभाई। इन्‍होंने एक बार फिर कस्में वादे]) जैसी फिल्मों में अमित और शंकर तथा डॉन में अंडरवर्ल्ड गैंग और उसके हमशक्ल विजय के रूप में दोहरी भूमिका निभाई।इनके अभिनय ने इन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार दिलवाए और इनके आलोचकों ने त्रिशूल और मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्मों में इनके अभिनय की प्रशंसा की तथा इन दोनों फिल्मों के लिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इस पड़ाव पर इस अप्रत्याशित दौड़ और सफलता के नाते इनके कैरियर में इन्हें फ्रेन्‍काइज ट्रूफोट नामक निर्देशक द्वारा वन मेन इंडस्ट्री का नाम दिया।
1979 में पहली बार अमिताभ को मि० नटवरलाला नामक फिल्म के लिए अपनी सहयोगी कलाकार रेखा के साथ काम करते हुए गीत गाने के लिए अपनी आवाज का उपयोग करना पड़ा।फिल्म में उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार पुरुष पार्श्‍वगायक का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार मिला। 1979 में इन्हें काला पत्थर   सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया और इसके बाद 1980 में राजखोसला द्वारा निर्देशित फिल्म दोस्ताना में दोबारा नामित किया गया जिसमें इनके सह कलाकार शत्रुघन सिन्हां और जीनत अमान थीं। दोस्ताना वर्ष 1980 की शीर्ष फिल्म साबित हुई। 1981 में इन्होंने यश चोपड़ा की नाटकीयता फ़िल्म सिलसिला में काम किया, जिसमें इनकी सह कलाकार के रूप में इनकी पत्नी जया और अफ़वाहों में इनकी प्रेमिका रेखा थीं। इस युग की दूसरी फिल्मों में राम बलराम (1980), शान (1980), लावारिस (1981) और शक्ति (1982) जैसी फिल्‍में शामिल थीं, जिन्‍होंने दिलीप कुमार जैसे अभिनेता से इनकी तुलना की जाने लगी थीं।
1982 के दौरान कुली की शूटिंग के दौरान चोट
1982 में कुली  फिल्म में बच्चन ने अपने सह कलाकार पुनीत इस्सर  के साथ एक फाइट की शूटिंग के दौरान अपनी आंतों को लगभग घायल कर लिया था। बच्चन ने इस फिल्म में स्टंट अपनी मर्जी से करने की छूट ले ली थी जिसके एक सीन में इन्हें मेज पर गिरना था और उसके बाद जमीन पर गिरना था। हालांकि जैसे ही ये मेज की ओर कूदे तब मेज का कोना इनके पेट से टकराया जिससे इनके आंतों को चोट पहुंची और इनके शरीर से काफी खून बह निकला था। इन्हें जहाज से तुरंत स्पलेनक्टोमी के उपचार हेतु अस्पताल ले जाया गया और वहां ये कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहे और कई बार मौत के मुंह में जाते जाते बचे। यह अफ़वाह भी फैल भी गई थी, कि वे एक दुर्घटना में मर गए हैं और संपूर्ण देश में इनके चाहने वालों की भारी भीड इनकी रक्षा के लिए दुआएं करने में जुट गयी थी।इस दुर्घटना की खबर दूर दूर तक फैल गई और यूके के अखबारों की सुर्खियों में छपने लगी जिसके बारे में कभी किसने सुना भी नहीं होगा। बहुत से भारतीयों ने मंदिरों में पूजा अर्चनाएं की और इन्हें बचाने के लिए अपने अंग अर्पण किए और बाद में जहां इनका उपचार किया जा रहा था उस अस्पताल के बाहर इनके चाहने वालों की मीलों लंबी कतारें दिखाई देती थी। यह फिल्म 1983 में रिलीज हुई और आंशिक तौर पर बच्चन की दुर्घटना के असीम प्रचार के कारण बॉक्स ऑफिस पर सफल रही।
निर्देशक मनमोहन देसाई   ने कुली   फिल्म में बच्चन की दुर्घटना के बाद फ़िल्म के कहानी का अंत बदल दिया था। इस फिल्म में बच्चन के चरित्र को वास्तव में मृत्यु प्राप्त होनी थी लेकिन बाद में स्क्रिप्‍ट में परिवर्तन करने के बाद उसे अंत में जीवित दिखाया गया। देसाई ने इनके बारे में कहा था कि ऐसे आदमी के लिए यह कहना बिल्‍कुल अनुपयुक्त होगा कि जो असली जीवन में मौत से लड़कर जीता हो उसे परदे पर मौत अपना ग्रास बना ले। इस रिलीज फिल्म में पहले सीन के अंत को जटिल मोड़ पर रोक दिया गया था और उसके नीचे एक केप्‍शन प्रकट होने लगा जिसमें अभिनेता के घायल होने की बात लिखी गई थी और इसमें दुर्घटना के प्रचार को सुनिश्चित किया गया था।
बाद में ये मियासथीनिया ग्रेविस  में उलझ गए जो या कुली में दुर्घटना के चलते या तो भारीमात्रा में दवाई लेने से हुआ या इन्हें जो बाहर से अतिरिक्त रक्त दिया गया था इसके कारण हुआ। उनकी बीमारी ने उन्हें मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से कमजोर महसूस करने पर मजबूर कर दिया और उन्होंने फिल्मों में काम करने से सदा के लिए छुट्टी लेने और राजनीति में शामिल होने का निर्णन किया। यही वह समय था जब उनके मन में फिल्म कैरियर के संबंध में निराशावादी विचारधारा का जन्म हुआ और प्रत्येक शुक्रवार को रिलीज होने वाली नई फिल्म के प्रत्युत्तर के बारे में चिंतित रहते थे। प्रत्येक रिलीज से पहले वह नकारात्मक रवैये में जवाब देते थे कि यह फिल्म तो फ्लाप होगी।। 
राजनीति : 1984-1987
1984 में अमिताभ ने अभिनय से कुछ समय के लिए विश्राम ले लिया और अपने पुराने मित्र राजीव गांधी की सपोर्ट में राजनीति में कूद पड़े। उन्होंने इलाहाबाद लोक सभा  सीट से उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एच।एन। बहुगुणा  को इन्होंने आम चुनाव  के इतिहास में (68/2 %) के मार्जिन से विजय दर्ज करते हुए चुनाव में हराया था। हालांकि इनका राजनैतिक कैरियर कुछ अवधि के लिए ही था, जिसके तीन साल बाद इन्होंने अपनी राजनैतिक अवधि को पूरा किए बिना त्याग दिया। इस त्यागपत्र के पीछे इनके भाई का बोफोर्स विवाद  में अखबार में नाम आना था, जिसके लिए इन्हें अदालत में जाना पड़ा। इस मामले में बच्चन को दोषी नहीं पाया गया।
उनके पुराने मित्र अमरसिंह  ने इनकी कंपनी एबीसीएल के फेल हो जाने के कारण आर्थिक संकट के समय इनकी मदद कीं। इसके बाद बच्चन ने अमरसिंह की राजनैतिक पाटी समाजवादी पार्टी को सहयोग देना शुरू कर दिया। जया बच्चन ने समाजवादी पार्टी  ज्वाइन कर ली और राज्यसभा सभा  की सदस्या बन गई। बच्चन ने समाजवादी पार्टी के लिए अपना समर्थन देना जारी रखा,जिसमें राजनैतिक अभियान अर्थात प्रचार प्रसार करना शामिल था। इनकी इन गतिविधियों ने एक बार फिर मुसीबत में डाल दिया और इन्हें झूठे दावों के सिलसिलों में कि वे एक किसान हैं के संबंध में कानूनी कागजात जमा करने के लिए अदालत जाना पड़ा।
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो ये जानते हैं कि स्‍वयंभू प्रैस ने अमिताभ बच्‍चन पर प्रतिबंध लगा दिया था। स्‍टारडस्‍ट  और कुछ अन्य पत्रिकाओं ने मिलकर एक संघ बनाया, जिसमें अमिताभ के शीर्ष पर रहते समय 15 वर्ष के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया। इन्होंने अपने प्रकाशनों में अमिताभ के बारे में कुछ भी न छापने का निर्णय लिया। 1989 के अंत तक बच्चन ने उनके सैटों पर प्रेस के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा था। लेकिन, वे किसी विशेष पत्रिका के खिलाफ़ नहीं थे। ऐसा कहा गया है कि बच्चन ने कुछ पत्रिकाओं को प्रतिबंधित कर रखा था क्योंकि उनके बारे में इनमें जो कुछ प्रकाशित होता रहता था,उसे वे पसंद नहीं करते थे और इसी के चलते एक बार उन्हें इसका अनुपालन करने के लिए अपने विशेषाधिकार का भी प्रयोग करना पड़ा।
उसके बाद १९८८ में बच्चन फिल्मों में तीन साल की छोटी सी राजनैतिक अवधि के बाद वापस लौट आए और शहंशाह  में शीर्षक भूमिका की जो बच्चन की वापसी के चलते बॉक्स आफिस पर सफल रही। इस वापसी वाली फिल्म के बाद इनकी स्टार पावर क्षीण होती चली गई क्योंकि इनकी आने वाली सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल होती रहीं। 1991 की हिट फिल्म हम  से ऐसा लगा कि यह वर्तमान प्रवृति को बदल देगी किंतु इनकी बॉक्स आफिस पर लगातार असफलता के चलते सफलता का यह क्रम कुछ पल का ही था। उल्लेखनीय है कि हिट की कमी के बावजूद यह वह समय था जब अमिताभ बच्चन ने 1990 की फिल्‍म अग्निपथ  में माफिया डॉन की यादगार भूमिका के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, जीते। ऐसा लगता था कि अब ये वर्ष इनके अंतिम वर्ष होंगे क्योंकि अब इन्हें केवल कुछ समय के लिए ही परदे पर देखा जा सकेगा। 1992 में खुदागवाह  के रिलीज होने के बाद बच्चन ने अगले पांच वर्षों के लिए अपने आधे रिटायरमेंट की ओर चले गए। 1994 में इनके देर से रिलीज होने वाली कुछ फिल्मों में से एक फिल्म इन्सान्यित  रिलीज तो हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।
अस्थायी सेवानिवृत्ति की अवधि के दौरान बच्चन निर्माता बने और अमिताभ बच्चन कारपोरेशन लिमिटेड की स्थापना की। ए;बी;सी;एल;) 1996 में वर्ष 2000 तक 10 बिलियन रूपए (लगभग 250 मिलियन अमरीकी डॉलर) वाली मनोरंजन की एक प्रमुख कंपनी बनने का सपना देखा। एबीसीएल की रणनीति में भारत के मनोरंजन उद्योग के सभी वर्गों के लिए उत्पाद एवं सेवाएं प्रचलित करना था। इसके ऑपरेशन में मुख्य धारा की व्यावसायिक फ़िल्म उत्पादन और वितरण , ऑडियो और वीडियो कैसेट डिस्क , उत्पादन और विपणन के टेलीविजन सॉफ्टवेयर , हस्ती और इवेन्ट प्रबंधन शामिल था। 1996 में कंपनी के आरंभ होने के तुरंत बाद कंपनी द्वारा उत्पादित पहली फिल्म तेरे मेरे सपने  थी जो बॉक्स ऑफिस पर विफल रही लेकिन अरशद वारसी दक्षिण और फिल्मों के सुपर स्टार सिमरन   जैसे अभिनेताओं के करियर के लिए द्वार खोल दिए। एबीसीएल ने कुछ फिल्में बनाई लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म कमाल नहीं दिखा सकी। 1997 में, एबीसीएल द्वारा निर्मित मृत्युदाता , फिल्म से बच्चन ने अपने अभिनय में वापसी का प्रयास किया। यद्यपि मृत्युदाता ने बच्चन की पूर्व एक्शन हीरो वाली छवि को वापस लाने की कोशिश की लेकिन एबीसीएल के उपक्रम , वाली फिल्म थी और विफलता दोनों के आर्थिक रूप से गंभीर है ।एबीसीएल 1997 में बंगलौर में आयोजित 1996  की मिस वर्ल्ड सौंदर्य प्रतियोगिता   का प्रमुख प्रायोजक था और इसके खराब प्रबंधन के कारण इसे करोड़ों रूपए का नुकसान उठाना पड़ा था। इस घटनाक्रम और एबीसीएल के चारों ओर कानूनी लड़ाइयों और इस कार्यक्रम के विभिन्न गठबंधनों के परिणामस्वरूप यह तथ्य प्रकट हुआ कि एबीसीएल ने अपने अधिकांश उच्च स्तरीय प्रबंधकों को जरूरत से ज्यादा भुगतान किया है,जिसके कारण वर्ष 1997 में वह वित्तीय और क्रियाशील दोनों तरीके से ध्वस्त हो गई। कंपनी प्रशासन के हाथों में चली गई और बाद में इसे भारतीय उद्योग मंडल द्वारा असफल करार दे दिया गया। अप्रैल 1999 में मुबंई उच्च न्यायालय ने बच्चन को अपने मुंबई वाले बंग्ला  प्रतीक्षा और दो फ्लेटों को बेचने पर तब तक रोक लगा दी जब तक कैनरा बैंक की राशि के लौटाए जाने वाले मुकदमे का फैसला न हो जाए। बच्चन ने हालांकि दलील दी कि उन्होंने अपना बंग्ला सहारा इंडिया फाइनेंस के पास अपनी कंपनी के लिए कोष बढाने के लिए गिरवी रख दिया है। बाद में बच्चन ने अपने अभिनय के कैरियर को संवारने का प्रयास किया जिसमें उसे बड़े मियाँ छोटे मियाँ  (1998) से औसत सफलता मिली और सूर्यावंशम   (1999) , से सकारात्मक समीक्षा प्राप्त हुई लेकिन तथापि मान लिया गया कि बच्चन की महिमा के दिन अब समाप्त हुए चूंकि उनके बाकी सभी फिल्में जैसे लाल बादशाह  (1999) और हिंदुस्तान की कसम  (1999) बॉक्स ऑफिस पर विफल रही हैं।
टेलीविजन कैरियर
वर्ष 2000 में , बच्चन ने ब्रिटिश टेलीविजन शो के खेल, कौन बनेगा करोड़पति ?  को भारत में अनुकूलन हेतु कदम बढाया। शीर्ष‍क कौन बनेगा करोड़पति । जैसा कि इसने अधिकांशत: अन्य देशों में अपना कार्य किया था जहां इसे अपनाया गया था वहां इस कार्यक्रम को तत्काल और गहरी सफलता मिली जिसमें बच्चन के करिश्मे भी छोटे रूप में योगदान देते थे। यह माना जाता है कि बच्चन ने इस कार्यक्रम के संचालन के लिए साप्ताहिक प्रकरण के लिए अत्यधिक 25 लाख रुपए  लिए थे, जिसके कारण बच्चन और उनके परिवार को नैतिक और आर्थिक दोनों रूप से बल मिला। इससे पहले एबीसीएल के बुरी तरह असफल हो जाने से अमिताभ को गहरे झटके लगे थे। नवंबर 2000 में केनरा बैंक ने भी इनके खिलाफ अपने मुकदमे को वापस ले लिया। बच्चन ने केबीसी का आयोजन नवंबर 2005 तक किया और इसकी सफलता ने फिल्म की लोकप्रियता के प्रति इनके द्वार फिर से खोल दिए।
वापस लौटे :2000-वर्तमान
सन् 2000 में अमिताभ बच्चन जब आदित्य चोपड़ा  द्वारा निर्देशित यश चोपड़ा' की बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट फिल्म मोहब्बतें  में भारत की वर्तमान घड़कन शाहरुख खान के चरित्र में एक पुराने चापलूस की भूमिका की तब इन्हें अपना खोया हुआ सम्मान पुन: प्राप्त हुआ। दर्शक ने बच्चन के काम की सराहना की है , क्योंकि उन्होंने एक ऐसे चरित्र की भूमिका निभाई , जिसकी उम्र उनकी स्वयं की उम्र जितनी थी और अपने पूर्व के एंग्री यंगमैन वाली छवि (जो अब नहीं है) के युवा व्यक्ति से मिलती जुलती भूमिका थी। इनकी अन्य सफल फिल्मों में बच्चन के साथ एक बड़े परिवार के पितृपुरुष के रूप में प्रदर्शित होने में  कभी ख़ुशी कभी ग़म ( 2001) और बागबान  ( 2003) हैं। एक अभिनेता के रूप में इन्होंने अपनी प्रोफाइल के साथ मेल खाने वाले चरित्रों की भूमिकाएं करनी जारी रखीं तथा अक्स  ( 2001) , आंखें ( 2002) , खाकी  (2004) , देव ( 2004) और ब्लेक  ( 2005) जैसी फिल्मों के लिए इन्हें अपने आलोचकों की प्रशंसा भी प्राप्त हुई। इस पुनरुत्थान का लाभ उठाकर, अमिताभ ने बहुत से टेलीविज़न और बिलबोर्ड विज्ञापनों में उपस्थिति देकर विभिन्न किस्मों के उत्पाद एवं सेवाओं के प्रचार के लिए कार्य करना आरंभ कर दिया। 2005 और 2006 में उन्होंने अपने बेटे अभिषेक के साथ बंटी और बबली  (2005) , गॉड फॉदर, श्रद्धांजलि,सरकार  ( 2005) , और कभी अलविदा ना कहना (2006) जैसी हिट फिल्मों में स्टार कलाकार की भूमिका की। ये सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अत्यधिक सफल रहीं। 2006-07 के शुरू में रिलीज उनकी फिल्मों में बाबुल (2006) , और एकलव्य , नि:शब्द  (2007) बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं किंतु इनमें से प्रत्येक में अपने प्रदर्शन के लिए आलोचकों से सराहना मिली। इन्होंने चंद्रशेखर नागाथाहल्ली द्वारा निर्देशित कन्नड़ फिल्म अमृतधारा में मेहमान कलाकार की भूमिका की है।
मई 2007 में , इनकी दो फ़िल्मों में से एक चीनी कम और बहु अभिनीत शूटआउट एट लोखंडवाला   रिलीज हुई शूटआउट एट लोखंडवाला बॉक्स ऑफिस पर बहुत अच्छी रही और भारत में इसे हिट घोषित किया गया और चीनी कम ने धीमी गति से आरंभ होते हुए कुल मिलाकर औसत हिट का दर्जा पाया।
अगस्त2007 में, (1975) की सबसे बड़ी हिट फ़िल्म शोले  की रीमेक  बनाई गई और उसे राम गोपाल वर्मा  की आग शीर्षक से जारी किया गया। इसमें इन्होंने बब्बन सिंह ( मूल गब्बर सिंह ) के नाम से खलनायक की भूमिका अदा की जिसे स्वर्गीय अभिनेता अमजद खान  द्वारा 1975 में मूल रूप से निभाया था। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बेहद नाकाम रही और आलोचना करने वालो ने भी इसकी कठोर निंदा की।
उनकी पहली अंग्रेजी भाषा की फिल्म रितुपरनो घोष, द लास्ट ईयर का वर्ष 2007 में टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह  में 9 सितंबर 2007 को प्रीमियर लांच किया गया। इन्हें अपने आलोचकों से सकारात्मक समीक्षाएं मिली हैं जिन्होंने स्वागत के रूप में ब्लेक  में अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद से अब तक सराहना की है।
बच्चन शांताराम नामक शीर्षक वाली एवं मीरा नायर  द्वारा निर्देशित फिल्म में सहायक कलाकार की भूमिका करने जा रहे हैं जिसके सितारे हॉलीवुड अभिनेता जॉनी डेप  हैं। इस फ़िल्म का फिल्मांकन फरवरी 2008 में शुरू होना था, लेकिन लेखक की हड़ताल की वजह से, इस फिल्म को सितम्बर2008 में फिल्मांकन हेतु टाल दिया गया। 9मई, 2008, भूतनाथ  फिल्म में इन्होंने भूत  के रूप में शीर्षक भूमिका की जिसे रिलीज किया गया। जून 2008 में रिलीज हुई उनकी नवीनतम फ़िल्म सरकार राज, जो उनकी वर्ष 2005 में बनी फिल्म सरकार  का परिणाम है।
2005,अस्पताल में भर्ती
नवंबर २००५ में ,अमिताभ बच्चन को एक बार फिर लीलावती अस्पताल की आईसीयू  में विपटीशोथ  के छोटी आँत की सर्जरी लिए भर्ती किया गया। उनके पेट में दर्द की शिकायत के कुछ दिन बाद ही ऐसा हुआ। इस अवधि के दौरान और ठीक होने के बाद उसकी ज्यादातर परियोजनाओं को रोक दिया गया जिसमें कौन बनेगा करोड़पति  का संचालन करने की प्रक्रिया भी शामिल थी। भारत भी मानो मूक बना हुआ यथावत जैसा दिखाई देने लगा था और इनके चाहने वालों एवं प्रार्थनाओं के बाद देखने के लिए एक के बाद एक, हस्ती देखने के लिए आती थीं। इस घटना के समाचार संतृप्त कवरेज भर अखबारों और टीवी समाचार चैनल में फैल गए। अमिताभ मार्च 2006 में काम करने के लिए वापस लौट आए। 
आवाज के जादूगर
बच्चन अपनी जबरदस्त आवाज़ के लिए जाने जाते हैं। वे बहुत से कार्यक्रमों में एक वक्ता, पार्श्वगायक  और प्रस्तोता रह चुके हैं। बच्चन की आवाज से प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शतरंज के खिलाड़ी  में इनकी आवाज़ का उपयोग कमेंटरी के लिए करने का निर्णय ले लिया क्योंकि उन्हें इनके लिए कोई उपयुक्त भूमिका नहीं मिला था। फिल्म उद्योग में प्रवेश करने से पहले, बच्चन ने ऑल इंडिया रेडियो में समाचार उद्घोषक, नामक पद हेतु नौकरी के लिए आवेदन किया जिसके लिए इन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
बाराबंकी भूमि प्रकरण
के लिए भागदौड़  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव , २००७, अमिताभ बच्चन ने एक फिल्म बनाई जिसमें मुलायम सिंह सरकार के गुणगाणों का बखान किया गया था। उसका समाजवादी पार्टी  मार्ग था और मायावती सत्ता में आई। 2 जून, 2007, फैजाबाद अदालत ने इन्हें आदेश दिया कि इन्होंने भूमिहीन दलित किसानों के लिए विशेष रूप से आरक्षित भूमि को अवैध रूप से अधिग्रहीत किया है।जालसाजी से संबंधित आरोंपों के लिए इनकी जांच की जा सकती है। जैसा कि उन्होंने दावा किया कि उन्हें कथित तौर पर एक किसान माना जाए । यदि वह कहीं भी कृषिभूमि के स्वामी के लिए उत्तीर्ण नहीं कर पाते हैं,तब इन्हें 20 एकड़ फार्महाउस की भूमि को खोना पड़ सकता है जो उन्होंने मावल पुणे के निकट खरीदी थी। 19जुलाई , 2007 के बाद बच्चन ने बाराबंकी उत्तर प्रदेश और पुणे में अधिग्रहण की गई भूमि को छोड़ दिया। उन्होंने महाराष्ट्र, के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को उनके तथा उनके पुत्र अभिषेक बच्चन द्वारा पुणे में अवैध रूप से अधिग्रहण भूमि को दान करने के लिए पत्र लिखा।हालाँकि , लखनऊ की अदालत ने भूमि दान पर रोक लगा दी और कहा कि इस भूमि को पूर्व स्थिति में ही रहने दिया जाए। 11 दिसंबर,2007 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने बाराबंकी जिले में इन्हें अवैध रूप से जमीन आबंटित करने के मामले में हरी झंडी दे दी। बच्चन को हरी झंडी देते हुए लखनव की एकल खंडपीठ के न्यायधीश ने कहा कि ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं जिनसे प्रमाणित हो कि अभिनेता ने राजस्व अभिलेखों  में स्वयं के द्वारा कोई हेराफेरी अथवा फेरबदल किया हो। बाराबंकी मामले में अपने पक्ष में सकारात्मक फैसला सुनने के बाद बच्चन ने महाराष्ट्र सरकार को सूचित किया कि पुणे जिले  की मारवल तहसील में वे अपनी जमीन का आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार नहीं हैं।
राज ठाकरे की आलोचना
जनवरी,2008 में राजनीतिक रैलियों पर, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने अमिताभ बच्चन को अपना निशाना बनाते हुए कहा कि ये अभिनेता महाराष्ट्र की तुलना में अपनी मातृभूमि के प्रति अधिक रूचि रखते हैं। उन्होंने अपनी बहू अभीनेत्री एश्वर्या राय बच्चन के नाम पर लड़कियों का एक विद्यालय महाराष्‍ट्र  के बजाय उत्तर प्रदेश के बाराबंकी  में उद्घाटन के लिए अपनी नामंजूरी दी।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमिताभ के लिए राज की आलोचना, जिसकी वह प्रशंसा करते हैं, अमिताभ के पुत्र  अभिषेक  का ऐश्वर्या के साथ हुए विवाह में आमंत्रित न किए जाने के कारण उत्पन्न हुई जबकि उनसे अलग रह रहे चाचा बाल और चचेरे भाई उद्धव को आमंत्रित किया गया था।राज के आरोपों के जवाब में, अभिनेता की पत्नी जया बच्चन जो सपा सांसद हैं ने कहा कि वे ( बच्चन परिवार ) मुंबई में एक स्कूल खोलने की इच्छा रखते हैं बशर्ते एमएनएस के नेता उन्हें इसका निर्माण करने के लिए भूमि दान करें।उन्होंने मीडिया से कहा , " मैंने सुना है कि राज ठाकरे के पास महाराष्ट्र में मुंबई में कोहिनूर मिल की बड़ी संपत्ति है। यदि वे भूमि दान देना चाहते हैं तब हम यहां ऐश्वर्या राय के नाम पर एक स्कूल चला चकते हैं। इसके आवजूद अमिताभ ने इस मुद्दे पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।
बाल ठाकरे ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि अमिताभ बच्चन एक खुले दिमाग वाला व्यक्ति है और महाराष्ट्र के लिए उनके मन में विशेष प्रेम है जिन्हें कई अवसरों पर देखा जा चुका है।इस अभिनेता ने अक्सर कहा है कि महाराष्ट्र और खासतौर पर मुंबई ने उन्हें महान प्रसिद्धि और स्नेह दिया है। ।उन्होंने यह भी कहा है कि वे आज जो कुछ भी हैं इसका श्रेय जनता द्वारा दिए गए प्रेम को जाता है। मुंबई के लोगों ने हमेशा उन्हें एक कलाकार के रूप में स्वीकार किया है। उनके खिलाफ़ इस प्रकार के संकीर्ण आरोप लगाना नितांत मूर्खता होगी। दुनिया भर में सुपर स्टार अमिताभ है ।दुनिया भर के लोग उनका सम्मान करते हैं। इसे कोई भी नहीं भुला सकता है। अमिताभ को इन घटिया आरोपों की उपेक्षा करनी चाहिए और अपने अभिनय पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।" कुछ रिपोर्टों के अनुसार अमिताभ की राज के द्वारा की गई गणना के अनुसार जिनकी उन्हें तारीफ करते हुए बताया जाता है, को बड़ी निराश हुई जब उन्हें अमिताभ के बेटे अभिषेक की ऐश्वर्या के साथ विवाह में आमंत्रित नहीं किया गया जबकि उनके रंजिशजदा चाचा बाल और चचेरे भाई उद्धव  को आमंत्रित किया गया था।
मार्च 23, 2008 को राज की टिप्पणियों के लगभग डेढ महीने बाद अमिताभ ने एक स्थानीय अखबार को साक्षात्कार देते हुए कह ही दिया कि, अकस्मात लगाए गए आरोप अकस्मात ही लगते हैं और उन्हें ऐसे किसी विशेष ध्यान की जरूरत नहीं है जो आप मुझसे अपेक्षा रखते हैं। इसके बाद 28 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म अकादमी के एक सम्मेलन में जब उनसे पूछा गया कि प्रवास विरोधी मुद्दे पर उनकी क्या राय है तब अमिताभ ने कहा कि यह देश में किसी भी स्थान पर रहने का एक मौलिक अधिकार है और संविधान ऐसा करने की अनुमति देता है। उन्होंने यह भी कहा था कि वे राज की टिप्पणियों से प्रभावित नहीं है।